Babar History in Hindi – बाबर का इतिहास हिंदी

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बाबर का वास्तविक नाम जहीरूद्दीन मुहम्मद बाबर था। उसका पिता उमरशेख मिर्जा तैमूरलंग के वंश का था उसकी मां कुतुलुग निगारखानम चंगेज खाँ के वंश की थी। प्रसिद्ध इतिहासकार लेनपूल के अनुसार, “बाबर की नसों में मध्य एशिया के दो महान् योद्धाओं (चंगेजखाँ व तैमूर) का रक्त था।” जब 1483 ई. में बाबर का जन्म हुआ तो उसक पिता तुर्किस्तान की एक छोटी-सी रियासत फरगना का मालिक था।

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उमरशेख मिर्जा की मृत्यु (1494 ई. में) के समय बाबर की आयु केवल 11 वर्ष की थी। इतनी छोटी आयु में ही उसे फरगना की रियासत के प्रबंध का भार अपने कंधों पर लेना पड़ा। डा. इश्वरीप्रसाद के शब्दों में, “बाबर जो अभी एक कोमल किशोर ही था सब ओर से शत्रुओं द्वारा घेर लिया गया।” उसके सगे-सम्बंधी और उजबेग सरदार शैबानी खाँ उसकी रियासत को छीनना चाहते थे, परंतु बाबर ने उनके इरादों को विफल कर दिया और सुरक्षित रूप से फरगना का प्रबंध सम्भाल लिया।

बाबर और समरकन्द – बाबर के पिता उमरशेख मिर्जा ने समरकन्द पर अधिकार करने का असफल प्रयत्न किया। बाबर ने भी इस महत्वपूर्ण नगर, जो कभी तैमूर की राजधानी थी, को जीतने के कई प्रयत्न किए। उसे दो बार सफलता भी प्राप्त हुई। परंतु उसकी ये सफलताऐं उसे बड़ी महंगी पड़ीं तथा क्षणिक रहीं।

दूसरी बार उस नगर पर अधिकार करने के बाद शीघ्र ही उसे समाचार प्राप्त हुआ कि उज़बेग सरदार शैबानीखाँ ने उसकी फरगना रियासत पर अधिकार कर लिया है। जब वह फरगना पर अधिकार करने गया तो विद्रोही सरदारों ने समरकन्द पर भी अधिकार कर लिया। इस तरह बाबर के हाथों समरकन्द और फरगना दोनों ही जाते रहे। अपनी आत्म-कथा (तुज्के बाबरी) में बाबर ने लिखा है, “फरगना की खातिर मैंने समरकन्द छोड़ा था परंतु अब लगा कि मैंने दूसरे को प्राप्त किये बिना पहला भी गंवा दिया।”

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बाबर काबूल का शासक – समरकंद और फरगना दोनों को गवाने के बाद बाबर काबुल की तरफ अपना भाग्य आजमाने चल पड़ा। काबुल को वहां के असन्तुष्ट सरदारों की सहायता से उसने 1504 ई. में मुकीम नामक शासक को पराजित किया। उसने काबुल, गजनी और उसके आसपास के इलाकों को जीता।

काबुल में स्थिति सुदृढ़ करने के लिए अगले 14 वर्षों तक उसने अपने पूर्वजों के राज्य समरकन्द को उजबेगों से प्राप्त करने का असफल प्रयत्न किया। जब वह उज़बेगों से पूरी तरह से असफल हो गया तो उसने अपना ध्यान पश्चिम (मध्य एशिया) से हटाकर पूर्व (भारत) की ओर देना शुरू किया।

बाबर के प्रारम्भिक आक्रमण

बाबर का प्रारम्भिक आक्रमण – पानीपत की प्रथम लड़ाई 1526 ई. में बाबर और इब्राहीम के मध्य लड़ी गयी। पानीपत के मैदान की सफलता से पूर्व बाबर ने भारत पर चार आक्रमण किये। इन आक्रमणों के प्रभाव केवल उत्तरी-पश्चिमी सीमांत क्षेत्रों तक ही सीमित रहे। प्रारम्भिक आक्रमणों का संक्षेप में वर्णन निम्न प्रकार से है :

प्रथम आक्रमण – बाबर ने भारत पर आक्रमण 1519 ई. में किया। उसने बजौर के किले पर आक्रमण कर उस पर अधिकर कर लिया। इसके बाद बाबर ने झेलम नदी के किनारे पर स्थित भेरा नामक स्थान पर भी अधिकार किया। इसके बाद वह काबुल लौट गया।

दूसरा आक्रमण – बाबर ने 1519 ई. के अन्त में किया। इस बार उसने पेशावर में किलाबंदी करने की कोशिश की परंतु बदख्शां में गड़बड़ी फैलने के कारण वह इस कार्य को अधूरा छोड़कर ही वापस चला गया।

तीसरा आक्रमण – बाबर ने 1520 ई. में किया। इस बार उसने स्यालकोट और सैदयपुर पर अधिकार कर लिया। इस बार भी वह आगे न बढ़ सका क्योंकि कंधार में गड़बड़ हो जाने के कारण उसे वापस लौट जाना पड़ा।

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चौथा आक्रमण – बाबर ने 1524 ई. में दौलत खां के निमंत्रण पर किया। इस बार उसने लाहौर, दीपालपुर तथा जालन्धर पर अधिकार कर लिया। उसने दौलत खां लोदी (पंजाब के शासक) को केवल जालन्धर और सुल्तानपुर के क्षेत्र ही दिये और शेष पंजाब का इलाका आलमखां एवं दिलाबरखा नामक अपने मुगल सरदारों को देकर बाबर स्वयं स्वदेश लौट गया।

बाबर ने 1526 ई. में पानीपत के मैदान में दिल्ली सल्तनत के अन्तिम सुल्तान को हराकर भारत में मुगलवंश की नींव डाली।

भारत की राजनैतिक दशा

बाबर के आक्रमण के समय भारत की राजनैतिक स्थिति-बाबर के आक्रमण के समय भारत कई छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था, जो प्रायः परस्पर लड़ते रहते थे। बाबर के आक्रमण के समय उत्तरी भारत में सात राज्य थे तथा दक्षिण भारत में छः राज्य थे। उत्तरी भारत में दिल्ली सल्तनत के छोटे से राज्य पर इब्राहीम लोदी जैसा अयोग्य सुल्तान था जिसके विरूद्ध प्रायः विद्रोह होते रहते थे।

बंगाल में नसरतशाह एक योग्य तथा महात्वाकांक्षी शासक था। पंजाब का स्वतंत्र शासक दौलतखां लोदी था, जिसने बाबर को इब्राहीम लोदी के विरुद्ध आक्रमण करने के लिए निमंत्रण दिया था। सिन्ध और कश्मीर स्वाधीन राज्य बन चुके थे, परन्तु वे भारत की राजनीति में अधिक रूचि नहीं लेते थे। मालवा पर खिलजी वंश का महमूद द्वितीय शासक था।

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उसी के अधीन चन्देरी का मेदनीराव मेवाड़ के शासक राणा सांगा की सहायता से मालवा पर अधिकार करना चाहता था। मालवा राज्य में आन्तरिक झगड़े व विद्रोह भी चलते रहते थे। गुजरात का सुल्तान मुहम्मद मुज्जफरशाह द्वितीय बहुत शक्तिशाली था। परंतु मेवाड़ के राणा सांगा से उसकी शत्रुता थी तथा उसने उसे बुरी तरह पराजित किया।

1526 में उसकी मृत्यु के बाद उसी का पुत्र बहादुरशाह सुल्तान बना। मेवाड़ का राज्य सिसोदिया वंश के राणा सांगा के पास था जो उस समय उत्तरी भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक कहा जा सकता है। वह सारे भारत का शासक बनना चाहता था। कहा जाता है कि अपने इस स्वप्न को पूरा करने के लिए ही उसने सम्भवतः बाबर को भारत पर इब्राहीम लोदी के विरूद्ध आक्रमण के लिए बुलाया था।

दक्षिण भारत में बहमनी राज्य पांच छोटी-छोटी रियासतों में विभाजित हो चुका था। वे रियासतें थीं- बीजापुर, गोलकुण्डा, बीदर, बरार और अहमदनगर ये सभी राज्य यद्यपि शिया सम्प्रदाय के मुस्लिम शासकों के आधीन थे परंतु ये भी परस्पर लड़ते रहते थे। दक्षिण भारत में ही हिन्दू राज्य विजयनगर साम्राज्य हिन्दू राजा कृष्ण देव राय के आधीन था। वह बहुत ही शक्तिशाली राजा था।

परंतु उस राज्य की रूचि दक्षिण भारत की राजनीति में अधिक थी। उत्तर भारत की राजनीति में विजयनगर का प्रभाव नगण्य था। इस प्रकार भारत की विशृंखलित राजनैतिक स्थिति बाबर के हित में थी। भारत के अधिकांश छोटे-छोटे राज्य कमजोर थे। सभी राज्य परस्पर ईर्ष्या, द्वेष एवं शत्रुता रखते थे।

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वे कभी भी संगठित नहीं हो सकते थे। ऐसी अराजकतापूर्ण राजनैतिक दशा में भारत बाबर जैसे शक्तिशाली शत्रु का सामना कैसे कर सकता था? बाबर ने ऐसी राजनैतिक स्थिति का पूरा-पूरा लाभ उठाया।

बाबर के आक्रमण के कारण 

काबुल में अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के बाद बाबर ने एक बार फिर अपने पूर्वजों के राज्य समरकन्द को प्राप्त करने की असफल चेष्टा की। जब बाबर मध्य एशिया में बार-बार अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने में असफल रहा तो उसने भारत की तरफ 1525 ई. के बाद गम्भीरता से ध्यान देना शुरू किया। उसे भारत पर आक्रमण करने के लिए निम्न तत्वों एवं कारणों ने प्रेरित किया :

बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए प्रोत्साहन देने वाले तत्व

(1) बाबर की महत्वाकांक्षा – बाबर तात्कालीन वीर शासकों की तरह महत्वाकांक्षी था। बाबर स्वयं कहता है, “काबुल की प्राप्ति से लेकर (1504 ई.) पानीपत की विजय तक (1526 ई.) मैंने कभी भी हिन्दूस्तान को जीतने का विचार छोड़ा नहीं था।” उसे इस महान कार्य को करने के लिए उपयुक्त अवसर ही नहीं मिला। बाबर वास्तव में समरकंद (जिसे वह बहुत प्यार करता था) को प्राप्त करने के लिए लगातार संघर्ष में ही जुटा रहा। जब वह वहां पर असफल हो गया तो उसने अपनी महत्वाकांक्षा को भारत जीत कर पूरा करना चाहा।

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(2) भारत की अत्यधिक सम्पत्ति – बाबर ने भारत पर आक्रमण यहां की अतुल सम्पत्ति प्राप्त करने के लिए किया। जिस तरह पहले अनेक मध्य एशिया से आक्रमणकारी धन प्राप्त करने के लिए भारत आये उसी तरह बाबर भी आया। भारत को उस समय भी सोने की चिड़ियां कहा जाता था। बाबर ने भारत की सम्पत्ति के बारे में अनेक कहानियां सुन रखी थीं। भारत की सम्पत्ति ने बाबर को आक्रमण करने के लिए प्रात्साहित किया।

(3) कानूनी अधिकार एवं दायित्व – फिरोजशाह तुगलक के बाद तैमूरलंग ने भारत को जीता। वह यहां से पर्याप्त धन तथा अनेक शिल्पकार अपने साथ ले गया था। उसने पंजाब के कुछ क्षेत्रों को भी अपने राज्य में मिला लिया जो तैमूर के उत्तराधिकारीयों के आधीन रहे थे। जब बाबर ने काबुल पर अधिकार कर लिया तो उसने पंजाब व अन्य प्रदेशों पर अधिकार करना अपना कानूनी अधिकार माना। बाबर यही विचार रखते हुए अपने पूर्वज तैमूर के विजित सभी प्रदेशों को जीतने के लिए निकल पड़ा।

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(4) काबुल से निकटता – काबुल से भारत बहुत नजदीक है। इस प्रकार भौगोलिक कारणों ने भी बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए प्रोत्साहित किया।

(5) काबुल की आय बहुत कम थी – बाबर को काबुल से प्राप्त होने वाली आय बहुत कम थी। उसे कई बार अपनी सेना एवं कर्मचारियों को वेतन देने में कठिनाई होती थी। उसके पास कुछ सीमान्त प्रदेश ऐसे थे जहां पर उसे आय प्राप्ति से ज्यादा खर्च करना पड़ता था। इसलिए उसने अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए पंजाब जैसे उपजाऊ प्रदेश को जीतना चाहा।

इतिहासकार अबुलफजल इस तथ्य का समर्थन करते हुए संकेत देता है, “उसने (बाबर) बदख्शां, कन्धार और काबुल पर राज्य किया। इनसे प्राप्त होने वाली आय सेना की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नही थी। वास्तविकता तो यह है कि कुछ सीमांत प्रदेशों पर उसे आमदनी से ज्यादा खर्च कर देना पड़ता था।” इस तरह बाबर ने अपनी राजकीय आय को बढ़ाने एवं सैनिकों को अच्छा वेतन देने के लिए भारत को जीतना अच्छा समझा।

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(6) दौलत खाँ लोदी एवं राणा सांगा के निमंत्रण – कुछ इतिहासकारों के अनुसार बाबर को इब्राहीम लोदी पर आक्रमण करने के लिए पंजाब के शासक दौलतखाँ लोदी एवं मेवाड़ के राणा सांगा ने अलग-अलग निमंत्रण दिया था। इन निमंत्रणों से प्रेरित होकर बाबर ने भारत को जीतना चाहा।

(7) उजबेगों का भय – बाबर का भारत की तरफ बढ़ने का एक कारण यह भी था कि उसके दिल में उज़बेग आक्रमणों का काबुल पर डर था। उसने भारत को काबुल की तुलना में अधिक सुरक्षित स्थान समझा। उसने यह भी सोचा कि भारत में वह उजबेगों के विरूद्ध अपनी शक्ति सुदृढ़ आसानी से कर सकेगा।

(8) भारत की राजनैतिक स्थिति – बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित करने वाला अन्तिम परन्तु सबसे महत्वपूर्ण कारण तात्कालीन भारतीय राजनैतिक स्थिति थी। भारत उस समय करीब 13 छोटे-छोटे राज्यों में बंटा हुआ था। ये राज्य कभी भी संगठित नहीं हो सकते थे। यह परस्पर प्रायः झगड़ते रहते थे। दिल्ली का सुल्तान इन राज्यों पर नियंत्रण रखने में असमर्थ था। बाबर ने अराजकतापूर्ण राजनैतिक स्थिति को उपयुक्त अवसर समझ कर भारत पर आक्रमण कर दिया।

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पानीपत की प्रथम लड़ाई

पानीपत की प्रथम लड़ाई (1526 ई.) : बाबर अपनी सेना के साथ 1526 ई. में भारत को विजय करने पानीपत के प्रसिद्ध मैदान में पहुंचा। इब्राहीम लोदी लगभग 1 लाख सैनिकों तथा 1 हजार हाथियों के साथ उसका सामना करने के लिए आ पहुंचा। दूसरी ओर बाबर के पास केवल 12 हजार सैनिक थे।

यद्यपि बाबर की सेना संख्या में इब्राहीम लोदी से बहुत कम थी लेकिन उसने अपनी सेना की ब्यूह रचना एक वैज्ञानिक तरीके से की। बाबर की रणपद्धति को इतिहास में तुलगमा पद्धति (Tulaghma) के नाम से जाना जाता है। बाबर ने इस पद्धति के अनुसार अपनी सेना का एक बड़ा भाग पानीपत शहर में सुरक्षित रखा तथा बाकी सेना को लेकर एक लाभकारी स्थान पर मोर्चा लगाया।

उसकी सेना दायीं ओर से पानीपत शहर की ओर से सुरक्षित थी तो बायीं ओर से खाइयों से सुरक्षित थी। इन खाइयों को बाबर ने पेड़ों की शाखाओं एवं पत्तियों से ढक दिया था उसने सेना के केन्द्रीय भाग के सामने 700 गाड़ियां कच्ची खालों से परस्पर बांधकर लगा दीं। गाड़ियों के बीच बीच में जगह छोड़ दी गई।

जहां से सैनिक शत्रु पर एक साथ हमला कर सकें। हर दो गाड़ियों के बीच ईटों की छोटी-छोटी दीवारें बना दी गई ताकि सैनिक उन पर अपनी बन्दूकें और बारूद रख सकें तथा समयानुसार उसकी ओट ले सकें। 700 गाड़ियों के दायीं और बांयी ओर तोपचियों को लगा दिया गया। तोपचियों की रक्षा के लिए कुछ कच्चे मोर्चे भी बनाये गये। उस्ताद अली और मुस्तफा ने दांया और बांया पक्ष सम्भाल लिया।

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घुड़सवार सेना को तीन भागों में बांट दिया गया। इस सेना का बांया पक्ष योग्य सेनापति मुहम्मद मिर्जा के अधीन था तो दांया बाबर के पुत्र हुमायूं के अधीन था। बाबर ने स्वयं सेना का मध्य पक्ष सम्भाला। इस तरह बाबर ने एक वैज्ञानिक एवं कुशल युद्ध पद्धति का प्रयोग इब्राहीम के विरूद्ध किया। दूसरी ओर इब्राहीम लोदी एक विशाल सेना को लेकर पुरानी युद्ध पद्धति से बाबर से लड़ने को तैयार था।

दोनों सेना एक सप्ताह तक आमने-सामने खड़ी रहीं। 21 अप्रैल को बाबर ने अधीर होकर अपनी सेना को इब्राहीम की सेना पर आक्रमण करने का आदेश दिया। लोदी की सेना पूरी तरह मिट गई। बाबर ने स्वयं लिखा है, “सर्वशक्तिमान ईश्वर की दया और कृपा से दिल्ली की विशाल सेना आधे दिन के अन्दर-अन्दर धूल में मिल गई।” अनुमानतः सुल्तान इब्राहीम के साथ 15 या 16 हजार अफगान सैनिक युद्धभूमि में मारे गये। इस तरह बाबर ने एक शानदार विजय प्राप्त की।

बाबर की विजय के कारण – पानीपत की प्रथम लड़ाई में बाबर को कई कारणों से विजय प्राप्त हुई। उनमें से निम्न प्रमुख हैं :

(1) बाबर का योग्य सेना नेतृत्व – बाबर एक योग्य सैनिक तथा कुशल सेनाध्यक्ष था। उसने युद्ध क्षेत्र में तुलुगमा युद्ध पद्धति को अपना कर यह प्रमाणित कर दिया कि वह इब्राहीम से कहीं अधिक योग्य सेनापति है। उसने सेना को तीन भागों में बांटा। उसने मोर्चाबन्दी इस ढंग से की जिससे वह अपनी छोटी-सी सेना से लोदी की विशाल सेना को हरा सका।

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उसने कुछ सेना को ‘रिजर्व’ रखकर आवश्यकतानुसार उसका प्रयोग किया। उसने उजबेगों, तुर्की एवं ईरानियों से कुशल सेना नीतियों से सीख ली थी जिन सबका प्रयोग उसने पानीपत के मैदान में इब्राहीम लोदी के विरूद्ध किया।

(2) इब्राहीम की अलोकप्रियता एवं अकुशलता – इब्राहीम लोदी का व्यवहार अच्छा नहीं था जिससे कुछ सरदार गुप्त रूप से बाबर से मिल गये। उन्होंने बाबर की सहायता भी की। उसके अलोकप्रिय होने के कारण अन्य राजाओं ने उसे सैनिक सहायता नहीं दी। इब्राहीम लोदी सैनिक एवं नेतृत्व की दृष्टि से बाबर के समान कुशल नहीं था। उसके दुष्ट व्यवहार के कारण ही उसका चाचा आलमखां भी बाबर से जा मिला।

(3) बाबर का तोपखाना – बाबर का तोपखाना भी उसकी विजय का एक महत्वपूर्ण कारण था। बाबर ने पानीपत की प्रथम लड़ाई में बारूद का प्रयोग किया। उसकी तोपों का भारतीय शूरवीर सैनिक भी सामना न कर सके। बाबर के अत्यंत निपुण तोपची उस्ताद अली तथा मुस्तफा थे जिन्होंने लड़ाई के मैदान में तबाही मचा दी। प्रसिद्ध इतिहासकार श्री आर. बी. विलियम के अनुसार, “यदि किसी एक भौतिक तथ्य ने ही किसी और अन्य बात से उसकी (बाबर की) अन्तिम विजय का एक मार्ग बनाया तो वह उसका शक्तिशाली तोपखाना ही था।

(4) ईब्राहीम द्वारा बाबर की शक्ति का गलत मूल्यांकन – इब्राहीम ने भी बाबर की विजय को निश्चित कर दिया। लोदी की सेना ने यह सोचा कि बाबर की सेना थोड़ी है तथा उसे हराना बहुत आसान है। इससे लोदी सेना में जोश की कमी आयी। इससे भी बाबर को लाभ हुआ।

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(5) लोदियों द्वारा हाथियों का प्रयोग – इब्राहीम लोदी ने अपनी सेना में हाथियों का प्रयोग बड़ी मात्रा में किया। हाथियों की तुलना में बाबर के घोड़े अधिक फुर्तीले थे। प्रायः युद्ध में घायल हाथी अपनी सेना को ही रौंदता हुआ चला जाता था।

(6) भारतवासियों में आपसी फूट – भारतवासियों में आपसी फूट के कारण भी बाबर को विजय प्राप्त हुई। दौलत खां और आलमखां जैसे इब्राहीम के सगे सम्बंधियों ने भी उसकी मदद नहीं की। भारत के सभी बड़े-बड़े सरदार एवं राजा मिलकर एकता का परिचय देते हुए इब्राहीम की मदद करते तो बाबर कभी भी जीत नहीं सकता था।

(7) इब्राहीम की सैनिकों में निष्ठा का अभाव – इब्राहीम लोदी ने अधिकतर सैनिक अस्थायी रूप से सेना में भर्ती किये हुए थे। वे सभी भाड़े के टट्टू थे। बाबर के सैनिकों की तरह उनमें त्याग, राष्ट्र प्रेम की भावना नहीं थी। 

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