Alauddin Khilji History in Hindi – अलाउद्दीन खिलजी का इतिहास हिंदी

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अलाउद्दीन, जलालुद्दीन के एक भाई शिहाबुद्दीन मसऊद खिलजी का पुत्र था। शिहाबुद्दीन जलालुद्दीन के राज्यारोहण से पहले ही मर चुका था, इसी कारण अलाउद्दीन का लालन-पालन जलालुद्दीन की देख-रेख में हुआ था। जलालुद्दीन के सिंहासनारोहण के समय अलाउद्दीन, जो सुल्तान का भतीजा तथा अब दामाद बन चुका था, उत्सवाध्यक्ष (अमीर-ए-तुजुक) नियुक्त किया गया। बाद में उसके चाचा ने उसे कड़ा का जागीरदार बना दिया। यहीं पर अलाउद्दीन के दिमाग में बड़ी-बड़ी महत्वकांक्षाओं के बीज बोये गये।

Alauddin Khilji History in Hindi – अलाउद्दीन खिलजी का इतिहास हिंदी

सुल्तान बनने से पूर्व की विजयें1292 ई. में उसने मालवा पर आक्रमण किया तथा भिलसा का किला जीत लिया। इस विजय से प्राप्त धन सम्पत्ति को दिल्ली में सुल्तान के पास भेज दिया। सुल्तान उससे बहुत खुश हुआ। भिलसा विजय के समय अलाउद्दीन को पता चला कि देवगिरी के राजा के पास अपार धन सम्पत्ति है।

1294 ई. में अलाउद्दीन ने 8000 सैनिकों के साथ देवगिरी पर आक्रमण किया। वहां के यादव राजा रामचन्द्रदेव (रामदेव) को हराया ।। एक संधि के अनुसार एलिचपुर का प्रदेश दिल्ली राज्य में मिला लिया गया। अलाउद्दीन बहुत-सा सोना, चांदी, मोती, हाथी, घोड़े, व अन्य बहुमूल्य वस्तुएं लेकर लौट आया।

सिंहासनारोहण अलाउद्दीन ने धोखे से जलालुद्दीन का वध करवा दिया तथा स्वयं गद्दी सम्भाल ली। उसने जलालुद्दीन की बेगम मलिका महान को कैद कर लिया तथा उसके दोनों पुत्रों अरकली खां तथा कादिर खां को अंधा करवा दिया। अलाउद्दीन ने अमीरों को खुश तथा अपनी तरफ करने के लिए उनमें जागीरें बांटनी शुरू कर दीं। विद्रोही अमीरों को जागीरें जब्त कर ली गई तथा उन्हें कठोर दण्ड दिया गया। जनसाधारण को भी अपने पक्ष में करने के लिए खूब धन बांटा गया। इस तरह उसने अपनी स्थिति को सुदृढ़ किया।

अलाउद्दीन की सारे भारत के विजय की योजना – अलाउद्दीन के जीवन का प्रधान उद्देश्य सारे भारत को जीतकर उस पर शासन करना बन गया। उसने अपनी विजय योजना को दो भागों में पूरा करने का निश्चय किया। पहले उसने उत्तर भारत को जीता। एक-एक करके उत्तर भारत के सभी राज्यों को दिल्ली सल्तनत का अंग बना लिया।

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उत्तर भारत की विजयें

(i) गुजरात विजय – 1299 ई. में उसने अपने सेनापति अलूग खां तथा नुसरत खां को गुजरात विजय के लिए भेजा। गुजरात में उस समय राजा कर्णदेव राज्य करता था तथा वह एक शक्तिशाली राज्य था। मुस्लिम सेना ने गुजरात की राजधानी अन्हिलवाड़ा को घेरकर उसपर कब्जा कर लिया। अन्हिलवाड़ा व खम्बात को खूब लूटा। यहीं से नसरत खां ने मलिक काफूर नामक एक दास को खरीदा, जिसने आगे चलकर दक्षिण विजय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

(ii) रणथम्भौर की विजय – 1301 ई. में नुसरत खां तथा अलूग खां दोनों को वहां भेजा गया। रणथम्भौर का राजा हमीर अत्यंत वीर व साहसी था। अलाउद्दीन की सेना पहले आक्रमण में किला न जीत सकी तथा इस आक्रमण में नुसरत खां मारा गया। दूसरी बार स्वयं अलाउद्दीन ने आक्रमण का नेतृत्व किया। हमीर ने डटकर सामना किया। 11 महीने तक अलाउद्दीन को विजय प्राप्त न हो सकी। हमीर के सेनापति ने उसके साथ विश्वासघात किया तथा शत्रु से जा मिला। 1301 ई. में रणथम्भौर का किला अलाउद्दीन के हाथ में आ गया। हमीर तथा उसके परिवार को कत्ल कर दिया गया।

(iii) चित्तौड़ – अलाउद्दीन मेवाड़ को भी अपने अधीन करना चाहता था। 1303 ई. में उसने चित्तौड़ (मेवाड़ की राजधानी) पर आक्रमण किया। राजपूत सेनापतियों-गोरा तथा बादल ने आरम्भ में शत्रु के दांत खट्टे कर दिये, किन्तु वे अधिक समय तक शत्रु का मुकाबला न कर सके। चित्तौड़ पर अलाउद्दीन का अधिकार अवश्य हो गया किन्तु कुछ ही वर्षों बाद वह फिर स्वतंत्र हो गया।

(iv) मालवा और मध्य भारत – 1305 ई. में अलाउद्दीन की सेनाओं ने मालवा के शासक महलकदेव पर आक्रमण किया। उसने बड़ी वीरता से डटकर मुकाबला किया लेकिन विजय सुल्तान को ही प्राप्त हुई। ऐनलमुल्क मुलतानी वहां का शासक नियुक्त किया गया। अलाउद्दीन ने 1308 ई में सिवाना पर आक्रमण कर, वहां के राजा शीतलदेव को हराया। सिवाना का अधिकांश भाग दिल्ली सल्तनत में मिला लिया गया।

जालौर के शासक ने पहले अलाउद्दीन की अधीनता स्वीकार कर ली थी किन्तु बाद में वह स्वतंत्र शासक की भांति रहने लगा। सुल्तान ने 1311 ई. में उसके विरूद्ध सेना भेजी। पहले तो सुल्तान की सेना की पराजय हुई लेकिन बाद में रिजर्व सेना आ जाने के कारण सुल्तान की सेना को विजय प्राप्त । सुल्तान ने कन्हड़देव के भई मालदेव को जालौर का शासक नियुक्त किया। इससे यह अनुमान लगता है कि उसने अपनी भाई के साथ विश्वासघात किया था।

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अलाउद्दीन की दक्षिण नीति

उत्तर भारत की विजय का कार्य समाप्त कर अलाउद्दीन ने दक्षिण भारत पर आक्रमण आरम्भ किए। उस समय दक्षिण में प्रमुख चार राज्य थे- (i) विन्ध्य पर्वतमाला के दक्षिण में वर्तमान महाराष्ट्र में यादवों का राज्य था। देवगिरी उनकी राजधानी थी। (ii) यादवों के दक्षिण पूर्व की ओर का पड़ोसी राज्य तेलंगना था जहां की राजधानी वारंगल थी। वहां पर काकतीय वंश के नरेश शासन करते थे।

(iii) देवगिरी के दक्षिण तथा तेलंगाना के दक्षिण-पश्चिम तथा पश्चिम की ओर होयसल वंश का राज्य था। उनकी राजधानी द्वारसमुद्र थी। (iv) सुदूर दक्षिण में पांडयों का राज्य था जिसकी राजधानी मदुरा थी। अलाउद्दीन का समकालीन कुलशेखर बहुत योग्य एवं प्रभावशाली शासक था। (v) इन महत्वशाली राज्यों के अलावा कुछ छोटे-छोटे राज्य भी थे।

अलाउद्दीन द्वारा दक्षिण अभियान छेड़ने के कारण –

(i) अलाउद्दीन एक महत्वाकांक्षी शासक था। वह उत्तर भारत के साथ-साथ दक्षिण भारत को भी अपने नियंत्रण में रखना चाहता था।

(ii) अलाउद्दीन दक्षिण की अपार सम्पत्ति को प्राप्त में करना चाहता था।

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अलाउद्दीन का दक्षिण के विरूद्ध अभियान

(i) देवगिरी – 1307-8 ई. में मलिक काफूर के अधीन दूसरी बार सेना को देवगिरी भेजा गया क्योंकि वहां के शासक रामचन्द्र ने पिछले तीन वर्षों से दिल्ली को कर नहीं भेजा था। दूसरा, रामचन्द्र ने अलाउद्दीन के शत्रु गुजरात के शासक राजा करण बघेला व उसकी पुत्री को शरण दी थी। मुस्लिम सेना ने सबसे पहले गुजरात के शासक राजा करण को पराजित कर उसकी बेटी देवल देवी को पकड़कर दिल्ली भेज दिया।

वहां पर उसका राजकुमार खिज्र खां से विवाह कर दिया। अब राजा रामचन्द्र को पराजित कर दिल्ली भेजा गया। दिल्ली में उसके साथ उदारतापूर्ण व्यवहार किया गया। उसे क्षमा कर देवगिरी का गवर्नर नियुक्त किया गया। अलाउद्दीन ने रामचन्द्र से उदारता इसलिए दिखाई क्योंकि वह उसकी सहायता से सुदूर दक्षिण पर अपना अधिकार बनाए रखना चाहता था।

(ii) वारंगल पर विजय – 1309 ई. में अलाउद्दीन ने वारंगल विजय के लिए मलिक काफूर को भेजा। वहां के राजा प्रतापरूद्रदेव की हार हुई। मलिक काफूर ने उसके साथ संधि कर अपार धन प्राप्त किया। उसने सुल्तान को वार्षिक कर देना भी स्वीकार किया।

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(iii) द्वारसमुद्र पर आक्रमण – (1310-11 ई.) इन राज्यों पर अब तक किसी ने आक्रमण नहीं किया था। द्वारसमुद्र पर राजा बल्लाल (तृतीय) राज्य करता था। मलिक काफूर ने देवगिरी तथा वावरंगल की सहायता के द्वारसमुद्र पर आक्रमण कर दिया। राजा बल्लाल दिल्ली की विशाल सेना देखकर भयभीत हो गया तथा उसने बिना लड़े ही संधि कर ली।

(iv) मालावार की विजय – द्वारसमुद्र को जीतकर मलिक काफूर मालाबार की तरफ बढ़ा। मालाबार में उस समय पाण्ड्य राजा राज्य करता था। वहां पर गद्दी के उत्तराधिकार के लिए लड़ाई-झगड़ा चल रहा था। मालाबार का शासक हारकर भाग गया। मलिक काफूर ने रामेश्वरम तक उसका पीछा किया। मुसलमानों ने इस राज्य की राजधानी मदुरा पर अधिकार कर लिया तथा जी भरकर लूटमार की। इस विजय से मलिक काफूर के हाथ अपार धन सम्पत्ति लगी।

अलाउद्दीन ने दक्षिण भारत के सम्बंध में बड़ी दूरदर्शिता से काम लिया। वह दक्षिणी राज्यों को जीतकर अपना साम्राज्य बढ़ाना नहीं चाहता था। उसके पास विशाल सेना थी जिसके लिए उसे काफी धन चाहिए था। यह धन उसे दक्षिण से मिल सकता था। दूरस्थ राज्यों के शासन की कठिनाइयों को वह अच्छी तरह समझता था। इसी कारण उसने दक्षिण भारत के आक्रमणों से केवल धन ही एकत्र करके संतोष कर लिया।

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मंगोल नीति

अलाउद्दीन एवं मंगोल – भारत मंगोल आक्रमणों का रसास्वादान अल्तमश के काल से ही कर रहा था। परंतु अलाउद्दीन के समय हुए आक्रमणों की तुलना में पूर्व के सभी आक्रमण गौण थे, तथा यह भारत का सौभाग्य था कि इस देश पर वे विकट प्रहार ऐसे समय हुए जब अलाउद्दीन जैसा योग्य एवं शक्तिशाली सुल्तान शासक था।

पहला आक्रमण – अलाउद्दीन के काल में सबसे पहला आक्रमण 1296 ई. में अमीर दाऊद के नेतृत्व में हुआ। उसने मुल्तान एवं सिंध पर अधिकार कर लिया। किन्तु अलाउद्दीन के उलुग खाँ तथा जफर खाँ जैसे सरदारों ने उसे परास्त कर दिया।

दूसरा आक्रमण – सन् 1297 ई. में मंगोलों ने दिल्ली के पास सीरी दुर्ग पर कब्जा कर लिया किन्तु अलाउद्दीन के सीमांत रक्षक जफर खाँ ने मंगोलों को परास्त कर उस दुर्ग पर पुनः अधिकार कर लिया। इस सफलता से सेनापति जफर खाँ का यश इतना बढ़ गया कि सुल्तान अलाउद्दीन तथा उसी का भाई अलुग खाँ उससे ईर्ष्या करने लगे।

तीसरा आक्रमण – अलाउद्दीन के काल में मंगोलों का तीसरा आक्रमण 1299 ई. में हुआ। उनका नेता कोई दो लाख सैनिकों के साथ लूटमार करता हुआ दिल्ली के समीप पहुंच गया। इस आक्रमण का सामना दाहिनी ओर से ‘रूस्तम-ए-हिन्द’ जफर खाँ कर रहा था तो बायीं ओर से उलुग खाँ कर रहा था। अपने ईर्ष्यालु स्वभाव के कारण अलुग खाँ ने जफर खाँ की पूरी मदद न की और मंगोल सैनिकों ने जफर खाँ को घेरकर उसकी हत्या कर दी, किन्तु अलाउद्दीन की सेना के आतंक के सामने मंगोल ठहर न सके तथा भाग गए।

चौथा आक्रमण – मंगोलों का चौथा आक्रमण 1303 ई. में अलाउद्दीन चित्तौड़ को जीतने गया हुआ था। वहां से अभी वापिस आए सुल्तान को एक वर्ष ही हुआ था कि मंगोलों ने दिल्ली को घेर लिया। तारगी, जो केवल हुआ जबकि विजय के लिए तैयार होकर आया था, का धैर्य बिल्कुल समाप्त हो चुका था तथा अलाउद्दीन की किलेबंदी की सुदृढ़ता के कारण वह दो महीने ठहरने के उपरांत लौट गया। मंगोलों को मध्य एशिया में प्रायः व्यस्त रहना पड़ता था। फलतः यदि वे हिन्दुस्तान को थोड़े समय में जीत नहीं पाए तो विवश होकर लौट गए।

अलाउद्दीन द्वारा मंगोलों को रोकने के उपाय – मंगोलों के आक्रमणों को रोकने के लिए अलाउद्दीन ने बलबन की नीति का अनुसरण किया। पश्चिमी सीमा पर नए किले बनवाए तथा किलों की मरम्मत कराई। सेना की संख्या में वृद्धि की तथा उसे अधिक सुदृढ़ बनाया। सीमा प्रांतों की सुरक्षा का अच्छा प्रबंध किया। नए प्रकार के अस्त्र-शस्त्र तैयार करने की ओर ध्यान दिया गया। दिल्ली के समीप रहने वाले मंगोलों को कठोर दण्ड दिया गया। इस तरह की नीति अपनाकर अलाउद्दीन ने मंगोलों के आक्रमणों को रोका तथा देश में शांति स्थापित की।

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प्रशासनिक, सैनिक एवं आर्थिक सुधार

अलाउद्दीन खिलजी न केवल एक कुशल सेनानायक ही था, अपितु एक योग्य शासन प्रबंधक भी था। सुल्तान ने शासन प्रबंध में अनेक सुधार किए जिनका वर्णन इस प्रकार है

(1) सुदृढ़ केन्दीय शासन – अलाउद्दीन ने केन्द्रीय शासन को दृढ़ किया। उसने शासन को उलेमाओं एवं मुल्लाओं के प्रभाव से मुक्त किया। इस तरह सुल्तान शासन के विषयों में स्वेच्छाचारी बन गया। उसने राज्य की सारी शक्तियां अपने हाथ में ले लीं तथा बड़े-बड़े सरदारों की शक्ति का इस प्रकार दमन किया कि वे उसके शासनकाल में दोबारा सिर न उठा सकें।

सुल्तान ने अपनी सहायता के लिए अनेक मंत्रियों की नियुक्ति की हुई थी। राज्य से दूर स्थित भागों में सूबेदारों की नियुक्ति कर दी गयी। परगनों एवं ग्रामों का शासन भी वहां के स्थानीय अधिकारियों की देख-रेख में चलता था। राज्य के सभी अधिकारी पूर्णरूप सुन्तान के अधीन थे तथा कोई भी उसकी आज्ञा की अवहेलना नहीं कर सकता से था। फलस्वरूप देश में शांति की स्थापना हुई।

( 2 ) सरदारों की शक्ति का दमन – अलाउद्दीन ने सरदारों की शक्ति का दमन करने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए

(i) शराब पीने का निषेध – अलाउद्दीन ने स्वयं शराब पीना बंद कर दिया तथा शराब के शाही भंडार समाप्त कर दिए।

(ii) धन का छीनना – अलाउद्दीन ने अनेक जागीरदारों की जागीरें छीन ली। अमीरों, सरदारों व साधारण लोगों से उचित व अनुचित तरीकों से धन छीन लिया गया।

(iii) आपसी मेल-जोल का निषेध – शाही आज्ञा के बिना अमीरों वजीरों के आपसी मेल-जोल, भोजन करने तथा वैवाहिक सम्बंध स्थापित करने की मनाही कर दी गयी।

(iv)जासूस प्रथा – अलाउद्दीन ने सम्पूर्ण राज्य में जासूसों का जाल बिछा दिया।

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(3) सैनिक सुधार – अलाउद्दीन प्रथम सुल्तान था जो अपने सैनिकों को वेतन नकद भुगतान के रूप में देता था। अलाउद्दीन की सेना में पहले की भांति घुड़सवार, पैदल तथा हाथी सैनिक थे। अब भी अश्वारोहियों के ऊपर ही सेना की सफलता निर्भर करती थी। अतः अलाउद्दीन ने सेना के इस विभाग को अधिकाधिक उत्तम कोटि का बनाने की चेष्टा की।

सैनिक व उसके घोड़े ठीक दशा में हैं अथवा नहीं, इसकी जांच करने के लिए वह समय-समय पर सेना का निरीक्षण करता था। सेना को पूर्णतया अपने वश में करने के लिए उसने राज्य की सम्पूर्ण सैनिक शक्ति पर एकाधिकार स्थापित कर लिया। सैनिकों की प्रत्येक टुकड़ी गुप्तचर नियुक्त थे जो सैनिक अधिकारियों के विचारों तथा कार्यों के बारे में सुल्तान को सूचना देते रहते थे।

सैनिकों के अस्त्र-शस्त्र, कवच इत्यादि पर पूरा ध्यान दिया जाता था। उसने निकम्मे तथा बूढ़े सैनिकों को निकाल दिया। अलाउद्दीन ने पुराने किलों की मरम्मत करवाई और उनकी रक्षा के लिए अनुभवी सेनापतियों की नियुक्ति की। इसके अतिरिक्त उसने अनेक किलों का भी निर्माण करवाया तथा उन किलों में भी सुसज्जित सेनाएं रखीं। उसने युद्ध का सामान बनाने वाले अनेक कारखानों का निर्माण करवाया तथा उसमें अनके योग्य इंजीनियरों को नियुक्त किया गया।

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(4) आर्थिक सुधार – देश की रक्षा के लिए अलाउद्दीन को एक विशाल सेना का गठन करना पड़ा किन्तु इतनी बड़ी सेना का व्यय भूमि सुधारों, कर की वृद्धि तथा दक्षिण से प्राप्त धन से भी न चल सका तो उसने बाजार पर नियंत्रण किया तथा अनेक आर्थिक सुधार किए।

(1) भाव नियत करना – अलाउद्दीन ने सभी वस्तुओं के भाव कम तथा निश्चित कर दिए ताकि सैनिक थोड़े वेतन से ही गुजारा कर सकें

(2) अनाज इकट्ठा करने का प्रयास – अलाउद्दीन ने जमींदारों को आज्ञा दी कि वे अपनी उपज केवल सरकार के पास बेचें तथा भूमि-कर भी उपज के रूप में जमा करायें। अनाज को इकट्ठा करने के लिए बड़े-बड़े गोदाम बनावाए गए। अकाल के दिनों में जनता को नियत भाव पर अन्न दिया जाता था।

(3) आवागमन के साधनों पर नियंत्रण – वस्तुओं के आवागमन पर भी नियंत्रण रखा गया। माल को एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने वाले बंजारों को अपना नाम रजिस्टर में लिखवाना पड़ता था। व्यापारियों की जान एवं माल की रक्षा का प्रबंध किया जाता था।

(4) मंडियों की देखभाल के लिए अधिकारी नियुक्त करना – अलाउद्दीन ने दीवान-ए-रियासत एवं शाहन-ए-मंडी नामक उच्च अधिकारी नियुक्त किए जो इस बात का ध्यान रखते थे कि कोई दुकानदार कम तोलता तो उसके शरीर से उतना ही मांस काट लिया जाता था ।

(5) बाजार प्रबंध के प्रभाव

(i) इस बाजार प्रबंध से किसानों को बहुत हानि हुई। उन्हें भूमि कर के रूप में 50 प्रतिशत उपज सरकार को देनी पड़ती थी और शेष उपज भी निश्चित मूल्य पर बेचनी पड़ती थी।

(ii) इस प्रबंध से सर्वाधिक लाभ अलाउद्दीन खिलजी को हुआ क्योंकि कम कीमत पर वस्तुएं उपलब्ध होने से उसके सैनिकों का गुजारा थोड़े वेतन से हो जाता था।

(iii) व्यापार नियंत्रण से अमीरों को भी परेशानी हुई। उन्हें आमोद-प्रमोद की वस्तुएं बिना किसी रोक-टोक के प्राप्त नहीं होती थी।

(iv) इस प्रबंध से व्यापारियों के लाभ की मात्रा कम हो गई तथा व्यापार को बढ़ावा न मिला। 

(v) इस प्रबंध से दिल्ली की जनता को बहुत लाभ हुआ क्योंकि कम कीमत पर सभी वस्तुएं आसानी से उपलब्ध हो जाती थीं।

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अलाउद्दीन खिलजी की सफलता के कारण

दक्षिण में अलाउद्दीन खिलजी की सफलता के मुख्य कारण – अलाउद्दीन खिलजी ने 1305 ई. से लेकर 1311 ई. तक के समय में दक्षिण के देवगिरि, वारंगल, द्वारसमुद्र एवं मदुरा इत्यादि स्थानों को जीत लिया। दक्षिण में उसकी विजय के मुख्य कारण निम्नलिखित थे

(1) उन दिनों दक्षिण के राज्यों में संगठन का अभाव था।

(2) दक्षिण में उस समय कोई ऐसा शक्तिशाली साम्राज्य नहीं था जो अलाउद्दीन खिलजी का मुकाबला कर सकता, जिसके पास उत्तर का एक विशाल साम्राज्य था।

(3) अलाउद्दीन खिलजी ने मंगोलों के भय के कारण एक विशाल सेना निर्मित कर रखी थी। उसकी विशाल सेना के सामने दक्षिण के राज्यों का टिक पाना असम्भव था।

(4) अलाउद्दीन ने दक्षिण विजय का कार्य मलिक काफूर को सौंप रखा था जो न केवल एक महान् सेनापति था वरन् अलाउद्दीन का बड़ा वफादार भी था।

(5) मुसलमानों में धर्मिक जोश था। मलिक काफूर तथ उसके सैनिक इस्लाम के नाम पर लड़े। उन्होंने अनेक लोगों को मुसलमान बनाया तथा दक्षिण में मस्जिदें बनवाई।

 

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