Adi Shankaracharya – आदि शंकराचार्य

Adi-ShankaracharyaAdi Shankaracharya

बौद्ध और जैन धर्म के प्रचार-प्रसार के चलते दीर्घ काल से चला आ रहा सनातन धर्म भारत की पुण्य भूमि में लड़खड़ाने लगा था। वैदिक मंत्रोच्चार के स्थान पर बौद्ध बिहारों में धम्मपद और त्रिपिटक के शब्द गूंज रहे थे। चारों तरफ बौद्ध और जैन धर्म का बोलबाला था। महात्मा बुद्ध और महावीर ने सनातन धर्म में व्याप्त बलि प्रथा के विरुद्ध आवाज बुलंद की थी। कर्म की व्याख्या नये ढंग से करने का प्रयास किया था।

Adi Shankaracharya – आदि शंकराचार्य

उन लोगों ने वेद वेदांगों की उपेक्षा की थी। भारत के प्रसिद्ध सम्राट अशोक, वर्धन, कनिष्क आदि ने बौद्ध धर्म को राजधर्म घोषित कर एशिया के अनेक भूभागों में इसका प्रचार कराया। राजाओं का संरक्षण प्राप्त कर बौद्ध धर्म का बड़ी तीव्रता के साथ विकास हुआ। सनातन धर्म ऐसा लग रहा था कि इस पुण्य भूमि से सदा के लिए समाप्त हो जायेगा I

भगवान बुद्ध के निर्वाण की प्राप्ति के बाद बौद्ध धर्म में संगठनात्मक समस्या उत्पन्न हुई। उनके शिष्यों ने महात्मा बुद्ध के सिद्धांतों के अनुसार संघ का संचालन करना चाहा। कालक्रम से बौद्ध धर्म में भी मूर्ति पूजा प्रारंभ हो गई जिसका विरोध स्वयं तथागत ने किया था। बौद्ध धर्म में महायान, हीनयान और बाद में बज्रयान, तंत्रयान आदि समुदाय पैदा हुए। बौद्ध भिक्षुक त्याग तपस्या की और कम और भोग-विलास की ओर अधिक आकृष्ट होने लगे।

सातवीं शताब्दी में भारत के अन्तिम सम्राट हर्षवर्धन ने हिन्दुओं और बौद्धों के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया था। हर्षवर्द्धन के पहले गुप्तकालीन सम्राटों ने हिन्दू धर्म को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। बिखरे हुए सनातन धर्म को एक सूत्र में बांधने की चेष्टा की। उन लोगों ने मन्दिरों का निर्माण कराया और जीर्णोद्धार भी किया।

Adi Shankaracharya – आदि शंकराचार्य

फिर भी सनातन धर्म अपने पूर्व के गौरव को प्राप्त करने में असमर्थ था। सामान्य लोग बौद्ध भिक्षुओं की भोग-विलासिता से दुःखी थे। आवश्यकता थी एक ऐसे युगपुरुष की जो भारत में अवतरित हो सनातन धर्म की पताका फहराये। बौद्ध धर्म की त्रुटियों से जनमानस को अवगत करा उसके प्रति वितृष्णा का भाव उत्पन्न करे।

यह निर्विवाद सत्य है कि जब-जब इस धरती पर अनाचार की वृद्धि एवं संत-उत्पीड़न होने लगता है तब-तब परमात्मा या उनकी प्रेरणा से कोई दिव्यात्मा अवतार ले सद्धर्म की पुनः स्थापना करती है। धरती को अत्याचार से मुक्त करती है। आठवीं ई. के अन्त में वैसे ही एक दिव्य पुरुष का भारत में अवतरण हुआ जिन्हें हम आदि शंकराचार्य के नाम से जानते हैं। आदि शंकराचार्य को भगवान देवाधिदेव महादेव का एक अंशावतार माना जाता है।

आदि शंकराचार्य ने आज के केरल राज्य के कालड़ी नामक गांव में एक सनातनी नम्बूदरी ब्राह्मण-दम्पति विशिष्टा और शिवगुरु के घर में जन्म ग्रहण किया। बालक शंकर में अद्भुत प्रतिभा विद्यमान थी। बाल्यावस्था में ही उन्होंने कई सदग्रन्थों को कण्ठस्थ कर लिया था। उनका उपनयन 8 वर्ष की अवस्था में किया गया। सोलह वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने षट्दर्शन का सांगोपांग अध्ययन कर लिया था।।

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आदि शंकराचार्य ने सम्पूर्ण धर्मग्रन्थों के अध्ययन के पश्चात् संन्यास व्रत ग्रहण करना चाहा। उनकी माता शंकर को संन्यासी बनने देना नहीं चाहती थीं। वे अपनी मां के परम भक्त थे। प्रेम और वैराग्य में द्वन्द्व शुरू हुआ। कुछ विशेष परिस्थितियां उत्पन्न हुई। माता ने उन्हें संन्यास ग्रहण करने की आज्ञा दे दी। भक्त पुत्र ने यह प्रतिज्ञा की–“संन्यासी जीवन व्यतीत करते हुए भी अन्तिम क्षणों में मां के दर्शन करेंगे।”

और यही हुआ भी। घूमते-घूमते शंकर नर्मदा तट पर आये जहां उन्होंने विख्यात गोड़पाद के आत्मज्ञानी शिष्य गोविन्दपाद से दीक्षा ग्रहण की। अपने गुरु की आज्ञा से उन्होंने भगवान वेदव्यास के वेदान्त सूत्रों पर भाष्य लिखा। इस कार्य के संपादन के पश्चात् वे दिग्विजय की ओर निकले। हिमालय से कन्याकुमारी और कश्मीर से आसाम तक की पैदल यात्रा की।

उनकी मान्यता थी कि बिना भारत के भ्रमण किये हुए भारतीयों की आवश्यकताओं का ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता। उनकी दिग्विजय का लक्ष्य शास्त्रार्थ कर सनातन धर्म का महत्त्व स्थापित करना था। उन्होंने समकालीन प्रकाण्ड विद्वानों को शास्त्रार्थ में परास्त किया। इसी क्रम में बिहार भी पधारे।

Adi Shankaracharya – आदि शंकराचार्य

कुमारिल भट्ट के प्रख्यात शिष्य मण्डन मिश्र को शास्त्रार्थ में हरा दिया किन्तु विदुषी धर्मपत्नी भारती से परास्त हो गये। कामशास्त्र से संबंधित प्रश्नों के वे उत्तर न दे सके। पुनः उस शास्त्र का अध्ययन कर उन्होंने भारती के साथ शास्त्रार्थ किया। इस बार विजयश्री आदि शंकराचार्य जी को प्राप्त हुई। शास्त्रार्थ में परास्त अधिकांश विद्वान् उनके शिष्य बन गये।

बौद्ध धर्म का प्रभाव कम होने लगा। शंकराचार्य के कठोर परिश्रम और विद्वत्ता का ही फल है कि हिन्दुस्तान में बौद्ध धर्म अधिक नहीं फला-फूला। मण्डन मिश्र शंकराचार्य के प्रमुख चार शिष्यों में एक माने जाने लगे। संन्यास ग्रहण करने के पश्चात् उनका नाम सुरेश्वराचार्य पड़ा। मण्डन मिश्र के अलावा उनके प्रमुख तीन शिष्य थे–पद्मपाद, तटिकाचार्य और हस्तामलक अधिकांश बौद्धों को परास्त कर उन्होंने अद्वैत वेदान्त की महिमा और श्रेष्ठता को प्रतिष्ठापित किया।

“ब्रह्म सत्यम् जगत मिथ्या” को मंत्रोच्चारित कर समस्त विद्वानों को मंत्रमुग्ध कर दिया। अद्वैत धर्म की स्थापना के बाद उन्होंने इसके प्रचार-प्रसार के लिए बड़ा ही उल्लेखनीय कार्य किया। उन्होंने भारत की चार दिशाओं में चार मठ यथा- पूर्व में जगन्नाथपुरी में गोवर्धन में मठ, उत्तर में हिमालय बद्रिकाश्रम में जोशी या ज्योतिर्मठ, पश्चिम में द्वारका में शारदा मठ और दक्षिण में कर्नाटक राज्य के अंतर्गत शृंगेरी मठ की स्थापना की। इन मठों में उन्होंने अपने उपर्युक्त चार प्रमुख शिष्यों को पीठाधिपति नियुक्त किया।

Adi Shankaracharya – आदि शंकराचार्य

आज ये मठ अध्यात्मविद्या के केन्द्र है जहां पर सहस्त्रों ज्ञानपिपासु जाते हैं। आचार्य शंकर ने संन्यासियों की दस सुविख्यात श्रेणयां भी स्थापित की जो गिरि, पुरी, भारती, सरस्वती, तीर्थ, आश्रम, वन, अरण्य, पर्वत और सागर नाम से प्रसिद्ध हैं। ब्रह्मसूत्र, ग्यारह प्रमुख उपनिषदों और भगवतगीता पर भाष्य लिखकर आचार्य शंकर अमर हो गये हैं। आचार्य शंकर निर्विवाद रूप से वेदान्त दर्शन के सबसे महान आचार्य हैं।

उन्होंने अपनी तीक्ष्य मीमांसा द्वारा वेदान्त का सार लेकर उस अद्भुत अद्वैत तत्वज्ञान को प्रतिपादित किया जो उपनिषदों में निहित है। उन्होंने ब्रह्मविषयक परस्पर विरोधी व्याख्याओं में ऐक्य स्थापित करके यह दर्शाया कि चिरंतन सत्य केवल एक है। उनकी मान्यता थी कि -“चढ़ावे के मार्ग पर व्यक्ति धीरे-धीरे ही गमन कर सकता है, तदनुरूप विभिन्न व्यक्तियों की क्षमता के अनुसार विभिन्न साधन मार्ग हैं।

उनके प्रख्यात प्रकरण ग्रंथों से यथा-विवेकचूडामणि तथा अपरोक्षानुभूति आदि से उनके अगाध ज्ञान और अपरिमित कल्पनाशक्ति का पता चलता है। आचार्य शंकराचार्य के ये ग्रंथ आध्यात्मिक साधकों के लिए आवश्यक पच-प्रदर्शक हैं। आदि शंकराचार्य पूर्णतया अद्वैतवादी थे परन्तु उनका अंतःकरण प्रगाढ़ भक्तिभाव से ओत-प्रोत था।

Adi Shankaracharya – आदि शंकराचार्य

उनके द्वारा विरचित अद्वितीय स्रोत भक्ति एवं वैराग्य की भावना से ऐसे परिपूर्ण हैं कि इनसे पाषाणहृदय भी द्रवित हो उठता है। आदि शंकराचार्य ने अपने अद्भुत अद्वैत दर्शन द्वारा सारे देश को प्लादित कर धर्म में युगान्तकारी सुधार लाया। तदुपरान्त वे सन् 830 में बत्तीस वर्ष की आयु में हिमालय पर्वत पर स्थित केदारनाथ में ब्रह्मलीन हो गये।

आदि शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित अद्वैत दर्शन विश्व के अमूल्य निधि है। शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित विचारों से केवल भारत के लोगों ने ही नहीं, दुनिया के अनेक महापुरुषों ने प्रेरणा प्राप्त की। 8 वर्ष की अवस्था में वेद-वेदान्तों का सम्पूर्ण स्मरण कोई साधारण बात नहीं है। 16 वर्ष की अवस्था में समस्त विद्याओं का सांगोपाग अध्ययन कर जो दुर्लभ ग्रंथों की रचना शंकराचार्य जी ने की वह अभूतपूर्व है।

वैराग्य के तो वे अवतार थे ही, प्रेम और भक्ति की अविरल धारा उनके हृदय में प्रवाहित थी। समभाव से उन्होंने भगवान विष्णु, भगवान शिव और शक्ति की आराधना की। भज गोविन्दं भज गोविन्द गोविन्दं भज मूढमते यह स्रोत उनका भक्ति, वैराग्य और ज्ञान से ओत-प्रोत है। कोई भी भावुक व्यक्ति संसार की असारता से परिचित हो आदि पुरुष भगवान विष्णु या गोविन्द का भक्त हुए बिना नहीं रह सकता।

Adi Shankaracharya – आदि शंकराचार्य

उनकी देवाधिदेव महादेव करुणा सागर, भगवान शंकर की पंचाक्षर द्वारा स्तुति भक्ति प्रेरक है। आज भी लोग उसे गाकर मस्त हो जाते हैं। इसी प्रकार उन्होंने जगज्जननी भवतारिणी दुर्गा की भी स्तुति की है। इस प्रकार परम विरागी अद्वैतवादी होते हुए भी वैष्णव, शेव और शाक्त के बीच अद्भुत समन्वय स्थापित करने का उन्होंने अद्भुत प्रयत्न किया है।

सारा जगत शंकर के ज्ञान सागर में गोते लगाकर अमूल्य रत्न प्राप्त कर सकता है। अपने अन्दर ज्ञान दीपक प्रज्ज्वलित कर ब्रह्ममय हो सकता है। स्वामी विवेकानन्द ने आचार्य शंकर के संबंध में जो उद्गार व्यक्त किया है वह उल्लेखनीय है: और इस बार प्रकाय दक्षिण में हुआ एक ब्राह्मण बालक उत्थित हुआ, जिसके विषय में कहा जाता है कि उसने सोलह वर्ष की आयु में अपना समस्त लेखन कार्य भाष्य रचना आदि सम्पूर्ण कर लिया था।

यह असाधारण बालक शंकराचार्य थे। इस सोलह वर्षीय बालक द्वारा लिखे गये ग्रंथ आधुनिक जगत के लिए एक महान आश्चर्य है और ऐसा ही वह बालक था। उनकी यही अभिलाषा थी कि भारतवर्ष में पुरातन पावन परंपराओं का पुनः स्थापन हो। विचार करने की बात है कि उस बालक के सम्मुख कितना महान कार्य था।”

Adi Shankaracharya – आदि शंकराचार्य

“आचार्य शंकराचार्य एक महान तत्त्वज्ञानी थे। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि बौद्ध धर्म का सार तत्त्वतः वेदान्त दर्शन से भिन्न नहीं है। शंकर की सर्वोपरि गरिमा उनका गीता का प्रचार है। उस महापुरुष ने अपने अल्प जीवन में अनेक महान कार्य किये, किन्तु गीता का प्रचार और गीता पर उनका उत्कृष्ट भाष्य उनके सर्वोत्तम कार्यों में से है।”

आचार्य शंकर ने वेदों के सनातन धर्म की पूर्ण रक्षा की। उनके अनुयायी उन्हें शिव का अवतार मानते हैं…… तुम्हे शंकर अनुसरण करना चाहिए।”

आचार्य शंकर की वाणी महापुरुष अपने आचरण और व्यवहार से सामान्य जनो को प्रभावित करते रहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के तृतीय अध्याय में कहा है कि श्रेष्ठ पुरुषों के आचरण का ही सामान्य लोग अनुसरण करते हैं। विभूतियां जो प्रमाणित करती है आम जन उनको ही प्रमाणित मानते हैं

“यद्यदाचरति श्रेष्ठस्ततदेवेतरो जनः ।

स यतप्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ।

(गीता, तृतीय अध्याय, श्लोक-21 )

Adi Shankaracharya – आदि शंकराचार्य

आचार्य शंकर युगावतार पुरुष थे। हम पाठकों के लिए उनकी कुछ अमर वाणी अंत में उद्धृत करना अपना कर्तव्य मानते हैं :

अविद्या

(1) देह संघात आदि के साथ आत्मा की तद्रूपता मान लेना ही अविद्या या अज्ञान है।

(2) जिस प्रकार अंधेरे में पड़ी रस्सी में सर्प की कल्पना कर ली जाती है तथा शक्ति या सीपी को चांदी का टुकड़ा समझ लिया जाता है उसी प्रकार अज्ञानी पुरुष देह को ही आत्मा मान लेता है।

(3) जगत् के सत् होने का आभास भ्रम के कारण ही होता है। वस्तुतः यह भ्रम चिरंतन सत्य नहीं है।

(4) अविद्या अनिवर्धनीय और अनादि है-इसे कारण कहा जाता है। यह आत्मा पर आरोपित एक उपाधि है।

(5) अज्ञानी पुरुष फल की अभिलाषा से कर्म में प्रवृत्त होता है।

(6) अविद्या नश्वर फल उत्पन्न करती है जो क्षणिक होते हैं मानो वे प्रातः काल उत्पन्न होते हैं और सायंकाल नष्ट हो जाते हैं।

(7) जलती हुई मशाल तीव्र गति से घुमाई जाने पर जैसे सूर्य के सदृश गोल दिखाई पड़ने लगती है, उसी प्रकार अज्ञान के कारण मनुष्य आत्मा को देश मानता है।

(8) जिस प्रकार बादलों के चलने पर चन्द्रमा चलता-सा दिखाई पड़ता है, उसी प्रकार अज्ञान के कारण मनुष्य आत्मा को ही शरीर मान लेता है।

गुरु-शिष्य

(1) सच्चा गुरु वह है जो वेद विद्या में पारंगत, निष्कलुप, निष्काम, उत्तम ब्रह्मज्ञानी, ब्रह्म में मग्न, भरम अग्नि के सदृश शान्त, दया का अपार सागर और उन

समस्त सज्जनों का सुहृद हो जो उनके सम्मुख साष्टांग प्रणाम करते हैं।

(2) शिष्य को इस प्रकार के गुरु की भक्ति भाव से वन्दना करनी चाहिए। साष्टांग प्रणाम, सेवाभाव एवं विनम्रता से गुरु प्रसन्न होने पर शिष्य को अपनी जिज्ञासा के प्रकट करनी चाहिए।

(3) हे गुरुदेव, मेरी मृत्यु से रक्षा कीजिए। मैं जगदारण्य में लगी प्रचण्ड अग्नि से झुलस रहा हूँ, दुर्दिन के प्रचण्ड झंझावत में झकझोरा गया है, में बरत हूँ, प्रपीड़ित हूँ, आपकी शरण चाहता हूँ। में और किसी को नहीं जानता, मेरा दूसरा कोई ठिकाना नहीं। मेरी रक्षा कीजिए।

(4) इस भवभयनाश का एक राजमार्ग है, जिसके द्वारा तू संसार-सागर पार करके परमानन्द की प्राप्ति कर सकेगा।

Adi Shankaracharya – आदि शंकराचार्य

त्याग-माहात्म्य

(1) अरे झूठे, गोविन्द को भज गोविन्द को भज गोविन्द को भज। मृत्यु के सन्निकट आने पर फिर व्याकरण नियमावली (विद्वत्ता) किसी काम न आएगी।

(2) जब तक मनुष्य धनोपार्जन करता रहता है, उसके बन्धु-बान्धव उससे बड़ा प्रेम करते हैं, किन्तु वृद्धावस्था में जब उसका शरीर शिथिल हो जाता है और अन्तिम समय निकट आ जाता है तो फिर उसके सगे-संबंधी भी उससे वह नहीं पूछते कि कैसे हो ।

(3) भगवद्गीता का चाहे थोड़ा-सा ही अंश पढ़ लो अथवा गंगाजल की एक बूंद ही पी लो या प्रभु की उपासना चाहे एक ही बार कर लो, यम से भय से सदा के लिए मुक्ति मिल जाएगी।

(4) बचपन खेलकूद में बीत गया, यौवन कामासक्ति में समाप्त हो गया, वृद्धावस्था में व्यक्ति अपने कष्टों की चिंता करता है, किन्तु खेद है कि परमात्मा के लिए कोई भी व्याकुल नहीं होता।

(5) युवती को देखने पर जो मोह उत्पन्न होता है, वह अज्ञान और भ्रम के कारण होता है। बुद्धि द्वारा भीतर ही भीतर बारम्बार विचार करो कि शरीर रक्त, मांस और मज्जा का सम्मिश्रण मात्र है।

(6) मनुष्य के शरीर में जब तक प्राण रहते हैं, परिवार के लोग बड़े प्रेम से उसका कुशल-क्षेम पूछते रहते है। किंतु जब प्राण शरीर को छोड़ देते हैं तो पत्नी भी भयभीत होकर भाग जाती है। अतः केवल गोविन्द (ईश्वर) का ही भजन करो।।

(7) जो क्षणिक सुखों के लिए वासना के वशीभूत हो जाता है, वह अपने शरीर को रोगों के हाथ सौंप देता है। परन्तु फिर भी यह जानते हुए कि मनुष्य की अंतिम गति मृत्यु है, कोई भी पापाचरण को नहीं छोड़ता।

(8) अपने धन, यौवन और मित्रों पर कभी गर्व न करो। काल पलक मारते इन सबका अपहरण कर सकता है। भ्रम से परिपूर्ण इस मिथ्या जगत के प्रति आसक्ति का परित्याग कर दो और शीघ्र ही ब्रह्म साक्षात्कार करने एवं तद्रूप हो जाने का प्रयत्न करो।

(9) काम, क्रोध, मद, लोभ और मोह का परित्याग करो तथा स्मरण करो कि वस्तुतः तुम कौन हो। आत्म-साक्षात्कार के प्रति जो आंखें बन्द किये है। वे मूर्ख हैं, वे नरक भोगते हैं।

(10) मित्र और शत्रु, पुत्र, सगे-संबंधी, युद्ध या संधि किसी के प्रति भी आसक्त मत हो ! यदि तुम विष्णु-पद की प्राप्ति की इच्छा करते हो तो सभी विषयों को समदृष्टि से देखो।

Adi Shankaracharya – आदि शंकराचार्य

आत्मा

(1) सत्-चित्-स्वरूप आत्मा की अनुभूति सतत अभ्यास के बिना नहीं हो सकती। अतः ज्ञान-पिपासु को अभीष्टप्राप्ति के लिए दीर्घकाल तक ब्रह्म का चिंतन करना चाहिए।

(2) जिस प्रकार घट आदि पदार्थ दीएक से प्रकाशित हो उठते हैं, उसी प्रकार मन, इन्द्रियां आदि केवल आत्मा से प्रकाशित होती हैं। ये विषय स्वतः प्रकाशित नहीं हो सकते।

(3) जिस प्रकार प्रज्ज्वलित दीप को उसका अपना प्रकाश दिखाने के लिए अन्य दीप की आवश्यकता नहीं होती, उसी प्रकार बोधस्वरूप होने के कारण आत्मा को स्वयं को प्रकाशित करने के लिए अन्य किसी साधन की आवश्यकता नहीं पड़ती।

(4) रस्सी को सर्प मान लेने पर जिस प्रकार कोई व्यक्ति भयभीत हो जाता है, उसी प्रकार आत्मा को जीव समझ लेने पर व्यक्ति भयग्रस्त हो जाता है। मैं जीव नहीं, परमात्मा हूँ, यह अनुभूति होने पर व्यक्ति निर्भयता को प्राप्त हो जाता है।

(5) ज्ञानी पुरुष को विवेक द्वारा सम्पूर्ण दृश्य जगत् को आत्मा में ही विलीन कर लेना चाहिए और निरंतर यह चिंतन करते रहना चाहिए कि आत्मा आकाश के सदृश निर्मल है।

(6) ऊषाकाल में अरुण द्वारा अंधकार के तिरोहित हो जाने पर जिस प्रकार सूर्य उदित होता है, उसी प्रकार ज्ञान द्वारा अज्ञान के नष्ट हो जाने पर आत्मा प्रकट होता है।

(7) जो व्यक्ति सभी कर्मों का त्याग करके सर्वव्यापी देश-काल, निरपेक्ष, द्वन्द्वहारी, निर्मल एवं चिरंतन सुखदायी आत्मतीर्थ का सेवन करता है वह सर्वज्ञ एवं सर्वव्यापी हो जाता है तथा यहीं पर अमरत्व को प्राप्त कर लेता है।

Adi Shankaracharya – आदि शंकराचार्य

ब्रह्म

(1) जो सत्, चित्, आनन्द और अनन्त है, जो एकमेव अद्वितीय और असीम है, जो नित्य और सर्वव्यापी है, उसी को तू ब्रह्म जान

(2) जिसकी प्राप्ति के बाद फिर अन्य कोई वस्तु प्राप्त करने को नहीं रह जाती है, जिसके आनन्द के बाद फिर किसी अन्य आनन्द की कामना नहीं रहती औरजिसके ज्ञान के बाद फिर कुछ भी ज्ञातव्य नहीं रह जाता उसी को तू ब्रह्म जान I

(3) जिसके प्रकाश से सूर्य, चन्द्र आदि आलोकित हैं, किन्तु जो उनके प्रकाश से प्रकाशित नहीं हो सकता, बल्कि जिसके कारण सभी प्रकाशित हैं, उसी को तू ब्रह्म जान I

(4) जिस प्रकार लाल तपाये हुए लोहे के गोले में अग्नि भीतर और बाहर व्याप्त रहती हुई प्रकाशमान होती है, उसी प्रकार ब्रह्म जगत् के अन्तर्बाह्य में व्याप्त रहते हुए प्रकाशित होता है।

(5) जो कुछ हम देखते हैं, जो कुछ सुनते हैं, वह ब्रह्म ही है, अन्य कुछ नहीं। परम तत्त्व का ज्ञान हो जाने पर समस्त विश्व सच्चिदानन्द अद्वैत ब्रह्म ही दिखाई देता है।

(6) जिस प्रकार घट और मिट्टी में कार्य कारण संबंध विद्यमान रहता है, उसी प्रकार ब्रह्म और प्रपंच जगत के बीच भी वही संबंध विद्यमान रहता है। यह शास्त्रप्रतिपादित और तर्कसिद्ध सत्य है।

(7) जिस प्रकार नमक का ढेला जल में घुल जाने पर फिर नेत्रों से दिखाई नहीं देता किंतु केवल जिह्वा द्वारा चखा जा सकता है, उसी प्रकार हृदय के अन्दर प्रवाहित नित्य ब्रह्म बाह्य इन्द्रियों द्वारा नहीं जाना जा सकता, केवल सिद्ध गुरु की इस अनुग्रहपूर्ण वाणी द्वारा ही जाना जा सकता है-“तू वास्तव में वही ब्रह्म है, इन्द्रियगोचर जगत् नहीं, तत्वमसि…….।”

Adi Shankaracharya – आदि शंकराचार्य

प्रकीर्ण

(1) इस संसार में तीन बातें अत्यंत दुर्लभ है और वे केवल ईश्वर की अनुकम्पा से ही प्राप्त होती हैं, वे हैं- मनुष्य जन्म, मुक्ति की इच्छा और महापुरुष की शरण I

(2) येन-केन-प्रकारेण मनुष्य जन्म और उसमें भी पुरुष शरीर मिल गया और वेदाध्ययन भर कर लिया। पर इसके बाद भी जो मनुष्य मुक्ति लाभ के लिए प्रयत्न नहीं करता, वह बड़ा मूर्ख है। बल्कि कहना चाहिए कि असत् वस्तुओं के पीछे भटककर वह मानो आत्महत्या ही कर रहा है।

(3) ज्ञान और कर्म के बीच पर्वत सदृश अडिग विरोध है। भगवान व्यास ने इस पर बहुत विचार करने के पश्चात् अपने पुत्र को इस प्रकार बोध कराया- इन दोनों मार्गों की वेदों में शिक्षा दी गयी है–एक है कर्म का मार्ग प्रवृत्ति और दूसरा त्याग का मार्ग या निवृत्ति ।

(4) दुःख और मोह उसके लिए हैं जो इच्छा और कर्म का कारण नहीं जानता उसके लिए नहीं जो आकाशवत् सर्वव्यापी शुद्ध-बुद्ध आत्मा को सर्वत्र देखता है।

(5) सत्य परम धाम है। वह परमधाम है क्योंकि उपनिषदों का भी वही गन्तव्य स्थल है। सत्य का अर्थ है मन, वाणी और कर्म से कपटाचरण का अभाव ।

(6) आत्मा ब्रह्म ही है। आत्मज्ञान के द्वारा कामना, कर्म और पुनर्जन्म का कारण अज्ञान निःशेषतया नष्ट हो जाता है। 

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