Acharya Narendra Dev – आचार्य नरेन्द्रदेव

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हमारे देश में उन्नीसवीं शताब्दी में अंग्रेजों ने पूर्ण सत्ता स्थापित कर ली थी। 1857 में फिरंगियों को देश से निकालने का असंगठित रूप में प्रथम प्रयास प्रारम्भ हुआ जिसने अंग्रेजों के दाँत खट्टे कर दिये। यह ठीक है कि गोरी सरकार ने सूझ-बूझ से काम लेकर इस आन्दोलन ने को कुचल डाला पर इसका प्रभाव अछूता न रहा।

Acharya Narendra Dev – आचार्य नरेन्द्रदेव

इस शताब्दी में भारत माँ के अनेक सपूतों ने आविर्भूत होकर विदेशी सत्ता को जड़ से उखाड़ने में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। ऐसे महान सपूतों में लोकमान्य तिलक, गोपालकृष्ण गोखले, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, डॉ. राजेन्द्रप्रसाद, पंडित जवाहरलाल नेहरू, आचार्य नरेन्द्रदेव, रामप्रसाद बिस्मिल, खुदीराम बोस, डॉ. राममनोहर लोहिया, बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर, सरदार वल्लभभाई पटेल, सरदार भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद आदि का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है।

कहना न होगा कि आचार्य नरेन्द्रदेव भारत माँ की एक अन्यतम विभूति थे जिनकी विद्वत्ता, समाज-सेवा, राष्ट्रप्रेम, तपश्चर्या से सारा देश परिचित है। वे प्रकाण्ड पण्डित, उत्कृष्ट वक्ता, प्रख्यात अध्येता, बहुभाषाविद् एवं मर्मज्ञ शास्त्रज्ञ थे। अपने उत्कृष्ट विचारों, अभिनव चिन्तन और अनुकरणीय आचरणों द्वारा देश, समाज और मानवता की उन्होंने जो सेवा की वह बेमिसाल है।

गीता की भाषा मे वे निष्काम कर्मयोगी थे और सदा अपने जीवन में संतुलन बनाये रखे। उन्होंने राजनीति, इतिहास, साहित्य, दर्शन का गहराई के साथ अध्ययन किया था। वे स्वामी विवेकानन्द की तरह पूर्ण परीक्षण के पश्चात् ही किसी विषय पर अपना विचार प्रकट करते थे। उन्होंने कार्ल मार्क्स के विचारों का मंथन तो किया था पर वे सदा उसे भारतीय परिप्रेक्ष्य में कार्यान्वित करने की कोशिश करते ।

Acharya Narendra Dev – आचार्य नरेन्द्रदेव

आचार्य नरेन्द्रदेव का जीवन बहुत ही सीधा-सादा था। उनमें दिखावा नहीं था। वे गम्भीर चिन्तक थे। अपने जीवन में उन्होंने जिन सिद्धान्तों को अपनाया, वे उन पर सदा अचल रहे खान-पान, रहन-सहन उनका बड़ा ही सुन्दर था। यही कारण था कि वे जीवन में कभी पथभ्रष्ट नहीं हो सके।

आचार्य नरेन्द्रदेव का लालन-पालन सुन्दर परिवेश में हुआ था जिस पर उनके पारिवारिक वातावरण की छाप स्पष्टतः दिखलाई पड़ती। उन्होंने मार्क्सवादी  विचारधारा का अध्ययन जरूर किया लेकिन वे भारतीय परम्परा का परित्याग न कर सके। बौद्ध धर्म पर उन्होंने बड़ा ही शोधपूर्ण ग्रंथ लिखा। निःसन्देह उनका यह ग्रन्थ बौद्ध दर्शन पर उत्कृष्टतम अध्ययन है।

ऐसा शोधपूर्ण ग्रन्थ विरले ही लोगों ने प्रस्तुत किया है। इतना होने पर भी उन्होंने कभी भी बौद्ध धर्म नहीं स्वीकारा उपलब्ध अधिक-से-अधिक दार्शनिक ग्रन्थों का अध्ययन करना वरेण्य है. पर अपने परम्परागत से चले आ रहे धर्म के प्रति आस्था रखना भी उत्कृष्ट व्यक्तियों की महानता है।

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जन्म – आचार्य नरेन्द्रदेव का जन्म 31 अक्टूबर, 1889 सदनुसार कार्तिक शुक्ला अष्टमी को उत्तर प्रदेश के सीतापुर नामक स्थान में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री बलदेवप्रसाद था। वे बहुत ही उत्कृष्ट वक्ता और हिन्दी-अंग्रेजी के सुविज्ञ लेखक थे। आचार्य नरेन्द्रदेव के पूर्व सियालकोट (पंजाब) के मूल निवासी थे। उनके पितामह सियालकोट से उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में व्यापार के लिए आए।

प्रारंभिक जीवन – वहीं बर्तन की छोटी सी दुकान कर ली जिससे उनके परिवार का भरण-पोषण होने लगा। आचार्य नरेन्द्रदेव के पिता श्री बलदेवप्रसाद एक प्रसिद्ध अधिवक्ता थे। स्वामी विवेकानन्द के पिता विश्वनाथ दत्त के समान ये भी एक लोकप्रिय और दानशील वकील थे। उनके घर में छोटे-बड़े सभी का सम्मान होता। उनकी आस्था परोपकार में थी।

तुलसी की इस पंक्ति में “परहित सरिस धर्म नहीं भाई, परपीड़ा सम नहीं अधमाई में विश्वास रखते। उनके यहाँ आने वालों में स्वामी रामतीर्थ और महान विद्वान, प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और उच्च कोटि के शिक्षाविद् महामना पण्डित मदनमोहन मालवीय जी भी थे। उदार पिता की तरह उनकी मातोश्री भी थीं। दुःखी जनों की सेवा करना, पति को आज्ञा मानना और ईश्वर की आराधना उनके प्रमुख कार्य थे। कहना न होगा कि आचार्य जी अपने पूज्य माता-पिता से काफी प्रभावित हुए थे।

Acharya Narendra Dev – आचार्य नरेन्द्रदेव

श्री बलदेवप्रसाद जी के चार पुत्र थे। उनका नाम महेन्द्रदेव, नरेन्द्रदेव, सुरेन्द्रदेव एवं योगेन्द्रदेव था। आचार्यजी के बड़े भाई महेन्द्रजी अपने पिता के पेशे में लगे अर्थात् वे नामी वकील हुए जिनका निधन नरेन्द्रदेव के बाद हुआ नरेन्द्रदेव के दोनों छोटे भाइयों की मृत्यु भरी जवानी में ही हो गई थी। आचार्य नरेन्द्रदेव ने समाज सेवा के साथ-साथ सुन्दर गृहस्त जीवन व्यतीत किया।

उनका पहला विवाह पन्द्रह वर्ष की अवस्था में हुआ था जिनसे एक पुत्र और एक पुत्री प्राप्त हुई थी पर इन तीनों का असामयिक निधन हो गया। तब नरेन्द्रदेव ने लाचार होकर सन् 1919 में दूसरी शादी की जिनसे कुल 5 सतानें हुई जिनमें तीन पुत्रियों और दो पुत्र थे। श्री बलदेवप्रसाद जी अपने पुत्रों को योग्यतम शिक्षकों द्वारा शिक्षा प्रदान करने के पक्षधर थे।

उनकी मान्यता थी कि बच्चे की सुसंस्कृत बनाने के लिए घर पर ही प्रारंभिक शिक्षा की व्यवस्था की जाये। उनके प्रायः सभी लड़कों ने उच्च शिक्षा प्राप्त की। आचार्य नरेन्द्रदेव की प्रारंभिक शिक्षा निजी शिक्षक द्वारा प्रारम्भ हुई। उन्हें अन्य विषयों के साथ श्रीमद्भगवद्गीता और गायत्री का भी ज्ञान कराया गया। बचपन में ही आचार्य जो गीता के शुद्ध श्लोकों का उच्चारण कर विद्वानों को भी चकित कर देते।

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प्रखर स्मरण शक्ति थी नरेन्द्रदेव को स्थानीय उच्च विद्यालय से उन्होंने मात्र 17 वर्ष की अवस्था में प्रवेशिका की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की। तदुपरान्त इलाहाबाद के म्योर सेन्ट्रल कॉलेज से 1909 ई. में प्रथम श्रेणी में ही इंटर की परीक्षा पास की। 1911 ई. में अंग्रेजी, इतिहास और संस्कृत विषयों से प्रथम श्रेणी में बी.ए. की परीक्षा पास की। वाराणसी के क्वीन्स कॉलेज से संस्कृत में एम.ए. किया। इलाहाबाद से 1915 ई. में एल.एल.बी. की डिग्री प्राप्त की और फैजाबाद में वकालत करने लगे।

विविध क्षेत्रो में योगदान – आचार्य नरेन्द्रदेव जी वैसे तो वकालत में भी ख्याति प्राप्त कर रहे थे। अगर उस पेशे में भी वे जीवनपर्यन्त रहते तो अक्षय कीर्ति और धन प्राप्त कर लेते। पंडित जवाहरलाल नेहरू नरेन्द्रदेव की सरलता और विद्वता से काफी प्रभावित थे। उन्होंने काशी में शिवप्रसाद दास गुप्त द्वारा स्थापित राष्ट्रीय शिक्षण संस्था काशी विद्यापीठ में अध्यापन कार्य करने की राय दी। वे एक सफल अध्यापक भी सिद्ध हुए।

उस विद्यापीठ के प्राचार्य डॉ. भगवान दास एवं श्रीप्रकाश और डॉ. सम्पूर्णानन्द प्राध्यापक थे। कुछ दिनों तक आचार्य नरेन्द्रदेव ने निःशुल्क अध्यापन किया पर अपने विशिष्ट मित्रों की राय से अंत में प्रति माह 150 रुपये लेना स्वीकार किया। 1926 ई. में वे काशी विद्यापीठ के प्राचार्य बनाये गये तब से वे आचार्य कहलाये।

Acharya Narendra Dev – आचार्य नरेन्द्रदेव

आचार्य नरेन्द्रदेव ने वैज्ञानिक समाजवाद का अध्ययन किया था। मार्क्स, गाँधी और रस्किन के ग्रन्थों का भी अवलोकन किया था। इसके अलावा भारतीय इतिहास, दर्शन और संस्कृत भाषा के प्रमुख ग्रन्थों का सांगोपांग अध्ययन किया था। बौद्ध धर्म दर्शन पर उनका शोधपूर्ण ग्रन्थ आज भी प्रासंगिक है।

बिहार राष्ट्र भाषा परिषद, पटना ने इनके इस अमूल्य ग्रन्थ को जो 600 से अधिक पृष्ठों में है, प्रकाशित कर विद्वत् वर्ग एवं सामान्य जन की अपूर्व सेवा की है। आचार्य नरेन्द्रदेव कई पत्र-पत्रिकाओं में सम्पादक भी रह चुके थे। अनेक पत्रो में लेख लिखते थे। उनकी प्रमुख कृतियों में राष्ट्रीयता व समाजवाद, समाजवाद व राष्ट्रीय क्रांति, समाजवाद: लक्ष्य तथा साधना, मार्क्सवाद और सोशलिस्ट पार्टी आदि हैं।

आचार्य नरेन्द्रदेव का राजनीतिक जीवन – आचार्य नरेन्द्रदेव जी ने अपना राजनीतिक जीवन महर्षि अरविन्द और तिलक द्वारा प्रतिपादित उग्र राष्ट्रवाद में भाग लेने से प्रारम्भ किया। उन्होंने पहले 1916 में तिलक से भेंट की और फैजाबाद में होमरूल की शाखा की स्थापना कर उसके सचिव बने। गाँधी द्वारा: संचालित असहयोग आन्दोलन में भी उन्होंने भाग लिया।

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नरेन्द्रदेव उत्तर प्रदेश और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य थे ही, नेहरू और सुभाषचन्द्र बोस द्वारा स्थापित इंडिपेन्डेन्स ऑफ इण्डिया लीग के 1928 में सचिव नियुक्त हुए। अन्य वरिष्ठ नेताओं के समान उन्होंने भी साइमन कमीशन के बहिष्कार में मनसा-वाचा-कर्मणा भाग लिया। 1930 के आन्दोलन में भाग लेने के कारण उन्हें तीन महीने की जेल की यात्रा करनी पड़ी।

फिर उन्हें 1932 ई. में रायबरेली में कर अदायगी के विरोध में हुए आन्दोलन में भाग लेने के कारण गिरफ्तार कर लिया गया। 1934 में उन्होंने कांग्रेस सोशलिस्ट कॉन्फ्रेन्स की अध्यक्षता की। उनकी गिनती प्रमुख समाजवादियों में होने लगी। कृषक आन्दोलन में भी वे काफी रुचि लेते। वे अखिल भारतीय किसान सभा के संस्थापक सदस्य थे। इसके ये दो बार अध्यक्ष निर्वाचित हुए।

सन् 1936 में उन्हें कांग्रेस की कार्यकारिणी का सदस्य बनाया गया और उत्तर प्रदेश विधान सभा के वे सदस्य भी निर्वाचित हुए पर मंत्रिमण्डल के सदस्य न बने। 1940 ई. में व्यक्तिगत सत्याग्रह आन्दोलन में भाग लेने के कारण तथा 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के चलते उन्हें जेल जाना पड़ा। 1945 ई. तक अहमदाबाद जेल में रहे।

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1946 ई. में भी वे विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। 1947 ई. में आचार्य नरेन्द्रदेव का नाम कांग्रेस के अध्यक्ष के लिए प्रस्तावित किया गया था, पर पटेल के विरोध के कारण वे इस पद को प्राप्त न कर सके। 1948 ई. में कांग्रेस से अत्यधिक मतभेद होने के कारण अपने कुछ साथियों के साथ उन्होंने विधानसभा की सदस्यता त्याग दी।

सन् 1947 से 1951 तक लखनऊ विश्वविद्यालय के उपकुलपति भी रहे। तदुपरान्त वे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के उपकुलपति भी बनाए गए पर अस्वस्थता के कारण 1953 ई. में त्यागपत्र दे दिया। आचार्य नरेन्द्रदेव ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी को 1952 ई. में कृषक मज़दूर प्रजा पार्टी में मिला दिया।

थाईलैण्ड में सन् 1950 ई. में सम्पन्न रीजनल कान्फ्रेन्स ऑफ दी वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ यूनाइटेड नेशन्स में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में उन्होंने भाग लिया। उन्होंने चीन की भी यात्रा की वे उत्तर प्रदेश विधानसभा से राज्य सभा के सदस्य भी निर्वाचित हुए थे। 1954 ई. में अपने दमा की बीमारी के इलाज के लिए आस्ट्रेलिया गये। उसी क्रम में उन्होंने जर्मनी, स्विटजरलैण्ड, इंगलेण्ड, बेल्जियम, फ्रास, इजिप्ट, इजराइल और चेकोस्लोवाकिया आदि की भी यात्रा की।

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1954 में नागपुर में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का अधिवेशन हुआ जिसकी अध्यक्षता स्वयं नरेन्द्रदेव ने की थी पर दल में बिखराव शुरू हो गया। उन्होंने एकता लाने का हर संभव उप्रयास किया पर सफलता नहीं मिली। डॉ. राममनोहर लोहिया ने कुछ साथियों के साथ मिलकर अलग दल का गठन कर लिया।

आचार्य नरेन्द्रदेव ने बुखारिन द्वारा रचित हिस्टोरिकल मेटरलीज्म से काफी प्रेरणा प्राप्त की थी। उन्होंने बुखारी द्वारा प्रतिपादित वर्ग के सिद्धान्त को स्वीकारा। उनका कहना था समाज में नौकरशाही और श्रमिकों के अलावा मध्यम वर्ग और मिश्रित वर्ग के लोग भी रहते है। आचार्य नरेन्द्रदेव जनतांत्रिक समाजवाद के पक्षधर थे, इसलिए उन्होंने राज्य द्वारा हस्तक्षेप का विरोध किया था। उनका कहना था कि उद्योग के प्रबन्धन में श्रमिकों का भी नियंत्रण होना चाहिए।

गाँधीवादी विचारधारा से आचार्य नरेन्द्रदेव पूर्णतः सहमत नहीं थे। उन्होंने समाज में विभिन्न वर्गों के अस्तित्व को स्वीकारा और कहा कि राष्ट्रीय आन्दोलन के संचालन में मध्यम वर्ग का ही विशेष प्रभाव है। उनका विचार था कि समाज में नव वर्गवाद का भी उदय हो रहा है। अतः जरूरी है कि लोगों की आर्थिक आवश्यकताओं की भी पूर्ति हो।

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छोटे-छोटे वर्गों को भी संगठित करने की जरूरत है। प्रचार एवं संगठन द्वारा विभिन्न वर्गों में राजनीतिक चेतना का संचार किया जा सकता है। वर्ग संघर्ष के परिप्रेक्ष्य में ही में लोगों की सामाजिक और आर्थिक आवश्यकताओं का अध्ययन करते। उन्होंने निम्न मध्यम और सामान्य जनो के संगठन पर जोर दिया।

आचार्य नरेन्द्रदेव ने समाजवादियों के बीच मेल-मिलाप कराने का प्रयास किया। वे दोनों आन्दोलनों को एक में मिला देना चाहते थे। आचार्य नरेन्द्रदेव ने किसानों की समस्याओं के निराकरण के लिए किसान संगठन पर जोर दिया। इधर स्वामी सहजानन्द ब्रह्मर्षि भी कृषको के बीच जागृति का शंखनाद कर रहे थे। ग्रामीण विकास के लिए उन्होंने साक्षरता आन्दोलन का समर्थन किया।

उनके विचारानुसार आम जनों की शिक्षा पर ही राष्ट्र का विकास निर्भर है। स्टालिन की तरह आचार्य नरेन्द्रदेव मानते थे कि पूरे कृषक वर्ग में समाजवादी सिद्धान्तो का प्रचार होना चाहिए अर्थात् समस्त कृषक वर्ग समाजवादी विचारधारा से जुड़े रहे। उन्होंने आर्थिक सुधार के लिए सहकारी समितियों पर जोर दिया था। कृषकों के ऋण की आमतौर पर माफी होनी चाहिए ऐसा उनका विचार था।

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जॉर्ज सोरे की हड़ताल संबंधी विचारधारा से वे काफी प्रभावित थे। उनका कहना था कि सोवियत संघ की तरह सर्वहारा वर्ग का यहाँ तो उदय नहीं हुआ है। उनके समान कोई संगठन भी मजबूत नहीं हो पाया है। इसलिए अमिक वर्ग को चाहिए कि राष्ट्रीय संघर्ष के लिए हड़तालों का सहारा ले। आचार्य नरेन्द्रदेव धर्मनिरपेक्ष विचारधारा में विश्वास रखते थे। भारतीय संस्कृति और दर्शन के प्रति उनका अधिक झुकाव था। उनके धर्मनिरपेक्षवाद में सभी धर्मों के लिए समुचित आदर का भाव था। वे धर्मग्रन्थ के अध्ययन पर जोर देते थे

मृत्यु – आचार्य नरेन्द्रदेव जी काम करते करते जर्जर हो चुके थे। राजेन्द्र बाबू की तरह दमा से वे पीड़ित थे। इसके अलावा वे अपने कुछ राजनीतिक मित्रों की अवसरवादी नीति से क्षुब्ध हो चुके थे। 1954 में बीमारी का इलाज विदेश में भी कराया था पर विशेष लाभ नहीं हुआ। 1955 ई. में गम्भीर रूप से अस्वस्थ हो गये। कर्मयोगी आचार्य नरेन्द्र जी का 19 फरवरी 1956 में कोयम्बटूर के इरोड नामक स्थान पर निधन हो गया। 

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