Abul Kalam – मौलाना अबुल कलाम आजाद

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“मुझे गर्व है कि में भारतीय हूँ और भारत की राष्ट्रीयता की अविभाज्य एकता का एक अंश हूँ।” ये शब्द मौलाना अबुल कलाम आजाद ने रामगढ़ कांग्रेस में अध्यक्ष पद से कहे थे। सचमुच आज भी इसकी सख्त जरूरत है। हम अपने विचारानुसार किसी भी धर्म का अवलम्बन कर सकते हैं, पर हमें भारतीयता का गर्व होना आवश्यक है। सचमुच जो कट्टर हिन्दू या मुसलमान है, वह किसी भी धर्म का विरोधी नहीं, वह तो सभी धर्मों में समान तत्त्व देखता है, केवल अपने धर्म में नहीं।

Abul Kalam – मौलाना अबुल कलाम आजाद

मौलाना आजाद कट्टर मुस्लिम होते हुए भी हिन्दुओं के प्रति सद्भावना रखते। उन्होंने एक स्थल पर कहा था कि “हिन्दू, मुसलमानो अगर तुम आपस में मेलजोल से रहना न सीखोगे तो नष्ट हो जाओगे। “मुस्लिम धर्मशास्त्र का जितनी गहराई के साथ मौलाना ने अध्ययन किया था, शायद की किसी अन्य ने कुरानशरीफ का अध्ययन किया हो।

वे पक्के मुसलमान थे, पर उन्होंने कभी भी दूसरे सम्प्रदाय की निन्दा नहीं की। अपने महान धर्म से असली तत्त्वों का उन्होंने सारा जीवन भारतीय जनमानस में प्रचार किया। उनका कहना था कि सबके साथ सद्भाव रखना, सबसे प्रेम करना, सबको अपना समझना और मानव मात्र को भाई-भाई मानना ही इस्लाम धर्म का मुख्य तत्त्व है। यह बात दूसरी है कि कुछ कट्टर मुस्लिम लीग के सदस्यों ने उनकी निन्दा की थी। पर अधिकांश भारत निवासी चाहे वे हिन्दू हो या मुसलमान, मोलाना की बड़ी इज्जत करते थे।

मौलाना धर्म के अध्ययन में अपना अधिक समय लगाते। धर्म के अध्ययन के साथ-साथ, वे समाज और राष्ट्र की भी सेवा करना अपना लक्ष्य मानते। मुसलमानों में हर प्रकार की सामाजिक सेवा करने के लिए आजाद ने मुसलमानों के लिए भारतवर्ष की सेवा का भी व्रत लिया था। वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के दृढ समर्थक थे। उनका कहना था कि मुसलमानों की सुरक्षा हिन्दू समाज की सद्भावना और एक सशक्त सरकार पर ही सम्भव है। ये मुसलमानों को भारत की मुख्य धारा में रखना चाहते थे।

Abul Kalam – मौलाना अबुल कलाम आजाद

मौलाना आजाद ने सर सैयद अहमद द्वारा प्रतिपादित इस विचार का खण्डन किया कि मुसलमानों को कांग्रेस का साथ नहीं देना चाहिए। उन्होंने जब से कांग्रेस में अपनी आस्था व्यक्त की, तब से जीवनपर्यन्त कांग्रेस में ही बने रहे। वे देश और धर्म दोनों का समान आदर करते थे।

जन्म – मौलाना अबुल कलाम आजाद का जन्म 17 नवम्बर, 1888 ई. में मुसलमानों के पवित्र नगर मक्का में हुआ था। बाल्यकाल भी उनका हिन्दुस्तान के बाहर ही बीता। उन्होंने अपनी शिक्षा भी मुस्लिम देशों में ही प्राप्त की। काहिरा के अलाजहद विश्वविद्यालय से धर्मशास्त्र में डिग्री प्राप्त की। अपनी शिक्षा समाप्त कर वे हिन्दुस्तान लोटे और कलकत्ता में रहने लगे।

यहाँ से ही उन्होंने ‘अलहिलाल’ नामक प्रसिद्ध राष्ट्रीय तथा धार्मिक पत्र निकाला। कुछ दिनों के बाद सरकार ने उसे बन्द कर दिया तो उन्होंने ‘अलवलह’ नामक अन्य पत्र निकाला। उन्होंने साम्प्रदायिकता का विरोध किया और राष्ट्रवाद का प्रचार किया और इसके माध्यम से सर सैयद अहमद खाँ द्वारा प्रतिपादित विचारों का भी विरोध किया। इनकी लेखनी में जहूद था। सभी उनके विचार से मुग्ध थे।

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मौलाना अबुल कलाम आजाद और कांग्रेस – मौलाना अबुल कलाम आजाद मुस्लिम लीग की गतिविधियों से वाकिफ थे। उनका विचार था कि कांग्रेस का मुस्लिम लीग के साथ समझौता हो जाये तो देश का अधिक हित हो सकता है। उनके प्रयत्न से 1916 में लखनऊ में कांग्रेस मुस्लिम लीग का समझौता हो गया। मौलाना मुहम्मद अली की तरह इनका कांग्रेस से घनिष्ठ संबंध असल में प्रथम महायुद्ध के बाद ही माना जाना चाहिए। इन्होंने खिलाफत आन्दोलन और असहयोग आन्दोलन में भाग लिया।

कुछ मुसलमानों ने खिलाफत आन्दोलन के बाद कांग्रेस का साथ छोड़ दिया, पर आजाद कांग्रेस में ही बने रहे। आन्दोलन के दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा। 1923 में वे कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये। पुनः 1940 में अध्यक्ष बनाये गये और उस पद पर 1946 तक बने रहे। जब वे 1943 में जेल में ही थे तब उन्हें अपनी पत्नी का वियोग सहना पड़ा।

उनके बाद अध्यक्ष का पद 6 जुलाई 1946 को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बम्बई में बैठक के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सम्भाला। कठिनाई के समय में मौलाना ने कांग्रेस की बागडोर अपने हाथ में ली और बड़ी योग्यतापूर्वक उसे निभाया।

Abul Kalam – मौलाना अबुल कलाम आजाद

उन मुसलमानों के विचारों का इससे पर्दाफाश हो गया कि कांग्रेस केवल हिन्दुओं कि ही संस्था है। असल में कांग्रेस राष्ट्रीय संस्था थी, उसमें हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख, ईसाई कोई भी अपनी सेवा और त्याग के बल पर अध्यक्ष पद प्राप्त कर सकता था। मौलाना आजाद अत्यधिक अध्यवसायी, ईमानदार और नेक विचार के नेता थे। वे महात्मा गाँधी, सरदार वल्लभभाई पटेल, राजगोपालाचारी और जवाहरलाल नेहरू के साथ-साथ काम करते रहे।

जब लार्ड वावेल ने शिमला में जून 1945 में सम्मेलन बुलाया था, तो भारतीय हितों का प्रतिनिधित्व मौलाना ने ही किया था। उनके नेतृत्व में हिन्दू-मुसलमानों दोनों ने ही आस्था व्यक्त की थी। अँग्रेज पदाधिकारियों ने भी यह मान लिया कि भारत का नेता अभी आजाद ही हैं। लार्ड वावेल कहा करता था कि यही वृद्ध भारतीयों का सच्चा वकील है।

शिमला से लौटने पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने उनकी भर्त्सना की थी। यहाँ तक कि कुछ विद्यार्थियों ने उनके साथ उदण्डता का व्यवहार भी किया था। इसे किसी ने पसन्द नहीं किया। एक साम्यवादी पत्रिका ने लिखा थापा दे नहीं जानते। कि मौलाना अबुल कलाम आजाद ने की मुसलमानों को साम्राज्यवाद का विरोध करना सिखलाया है।

Abul Kalam – मौलाना अबुल कलाम आजाद

क्या ये नहीं जानते कि समूची दुनिया के मुसलमानों में मौजूद सबसे बड़े विद्वानों में उनकी गणना होती है तथा उनकी 10 पीढ़ी से, अकबर बादशाह के जमाने से ही उनका ‘खानदान’ अपनी विद्वत्ता तथा पांडित्य के लिए प्रसिद्ध है? क्या उन्होंने ‘अलहिलाल’ से उनकी महान लेखनी का स्वाद नहीं लिया है अथवा उनका आत्मचरित ‘तनिकारा’ नहीं पढ़ा है?

कुरान पर उन्होंने इतनी ही विद्वत्तापूर्ण टीकाएँ लिखी है। इस्लाम और उसकी मातृभाषा के लिए वे सबसे बड़े पुजारी है। 1946 ई. में जब मंत्रिमण्डल आयोग भारत आया तो उसके साथ भी उन्होंने राजनीतिक प्रश्नों पर विचार-विमर्श किया। सर स्टाफर्ड किप्स अलेक्जेंडर ने उन्हें सबसे बड़े तथा सबसे अधिक सुलझे हुए देशभक्त और नेता बतलाया था। सरोजिनी नायडु ने भी लिखा है कि उनमें जन्मजात परिपक्वता थी।

मौलाना आजाद देश के विभाजन के पक्ष में नहीं थे, फिर भी 15 अगस्त, 1947 में भारत दो खण्डों में विभक्त हो गया। उन्होंने हिन्दुस्तान में रहकर जीवनपर्यन्त भारतवर्ष की सेवा की बहुत से बड़े-बड़े मुसलमानों ने मौके पर भारत का साथ नहीं दिया। मौलाना मुहम्मद अली और यहाँ तक कि सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा के कवि डॉ. सैयद इकबाल ने भी अन्त में जिन्ना का ही साथ दिया।

मौलाना आजाद, खान अब्दुल गफ्फार खान की तरह अडिग रहे। काजी नजरूल इस्लाम के विचारों से मुझे लगता है, मौलाना काफी प्रभावित हुए थे। बंगाली विप्लव कवि ने लिखा था कि “हिन्दू और मुसलमान दोनों भारत माँ की ही संतान है।” “एक टी मायेर दूटी छेले हिन्दू-मुसलमान” नजरूल ने महाकवि रहिमन और रसखान की तरह ही भगवान कृष्ण और काली की वंदना की थी।

Abul Kalam – मौलाना अबुल कलाम आजाद

पर वे अपने इस्लाम धर्म के प्रति भी मौलाना की तरह ही आस्थावान थे। एक स्थल पर नजरूल ने लिखा है, “अन्य दिये छो, फल दिये छो, दिये छो मीठा पानी, खुदा तुमार मेहरबानी ” तात्पर्य यह है कि महान लोग वे ही होते हैं, जो समाज को जोड़ने का प्रयास करते हैं, तोड़ने का नहीं। मौलाना अबुल कलाम आजाद एक सच्चे देशभक्त और नेक इंसान थे।

मोलाना अबुल कलाम आजाद एक अच्छे लेखक भी थे। उनकी पुस्तक ‘इण्डिया विन्स फ्रीडम’ भारत की आजादी के संघर्ष का विवरण प्रस्तुत करती है। इस पुस्तक में उन्होंने खुलकर अपने विचारों को अभिव्यक्त किया है। वे कट्टर कांग्रेसी होते हुए भी विचारों को दबाना जनहित में अच्छा नहीं मानते थे। यहाँ तक कि महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू आदि। के विचारों की भी कहीं-कहीं आलोचना की है। नेहरू ने उनकी पुस्तक जब देखी तो उन्हें कोई आश्चर्य नहीं हुआ, सहर्ष प्रकाशित करने की राय व्यक्त की। यही जवाहरलाल जी की महानता है।

पंडित जवाहरलाल और मौलाना सदा एक-दूसरे के निकट रहे। वैसे मौलाना से एक स्थल पर लिखा है कि वे कांग्रेस की आन्तरिक राजनीति में पटेल समर्थक नहीं थे, बल्कि वे नेहरूवादी थे। कुछ लेखकों के अनुसार आजादी के बाद उन्होंने इसे अपनी भूल माना। तत्कालीन हिन्दुस्तान टाइम्स के सम्पादक लाला दुर्गादास ने लिखा है: “आजाद इस सीमा तक गये कि उनसे पटेल के प्रति जो अन्याय हो गया था, उसके लिए उन्होंने दुःख व्यक्तः किया तथा आग्रहपूर्वक यह भी कहा कि यदि पटेल प्रधानमंत्री बने होते, तो अधिक अच्छा रहता।”

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आजाद तुरन्त वयस्क मताधिकार देना नहीं चाहते थे। उनका कहना था कि जब लोग इसके लिए पूर्णतः प्रशिक्षित हो जाएँ, तभी देना चाहिए और उसे प्रथम पन्द्रह वर्षों में उसका क्रमिक विकास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि “महात्मा गाँधी द्वारा जिन्ना को ‘कायदे आजम’ घोषित करना, नेहरू पर कृष्ण मेनन सरीखे लोगों का प्रभाव होना, नेहरू द्वारा श्रीमती माउन्टबेटन को अधिक प्रश्रय देना आदि ऐसी बातें थी जिनका भारत की अखण्डता एवं आजादी के आन्दोलन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

मृत्यु – मौलाना आजाद भारत सरकार के शिक्षा मंत्री बने और अपनी मृत्यु 22 फरवरी, 1958 तक अपने पद पर बने रहे। उनके सचिव प्रोफेसर हुमायूँ कबीर ने लिखा है कि आजाद शिक्षा के प्रचार में विशेष अभिरुचि लेते । शिक्षा विभाग में उनके द्वारा किये गये सुधार उल्लेखनीय हैं।

Shetkaryancha Asud

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