सुभाष चंद्र बोस – Subhas Chandra Bose

सुभाष-चंद्र-बोससुभाष चंद्र बोस

भारतीय स्वाधीनता संग्राम और आधुनिक भारत के निर्माताओं में सुभाष चन्द्र बोस का नाम सदैव अमर रहेगा। आधुनिक काल में जिन महापुरुषों ने देश विदेश मे भारतमाता का मस्तक ऊंचा किया है, उनमे नेताजी का विशेष स्थान है। उनका जोवन आरंभ से ही बड़ा ओजस्वी, तूफानी और वीरतापूर्ण रहा है।

सुभाष चंद्र बोस – Subhas Chandra Bose

1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद प्रथम बार सेना सजाकर विदेशी सत्ता को उखाड़ फेंकने का प्रयत्न इसी वीर पुरुष ने किया था। उनका ‘जयहिन्द’ का नारा देश के कोटि-कोटि कंठों मे गूंज उठा। उनका आजाद हिंद सेना का संगठन देश के स्वतंत्रता के इतिहास का एक अविस्मरणीय  अध्याय है।

• अपने शौर्य और संगठन शक्ति द्वारा दलित मानवता का उद्धार करने वाली, शिवाजी महाराज , वाशिंगटन, गैरी बाल्डी और ट्राट्स्की जैसी विश्व की अमर विभूतियों की कोटि में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का नाम सहज ही गिनाया जा सकता है। महात्मा गांधी के ‘भारत छोड़ो आंदोलन को नेताजी ने अपनी आजाद हिंद फौज के कार्यकलापों द्वारा बहुत शक्तिशाली बनाया, जिसका सगठन करने में उनके इस आह्वान ने “आप मुझे अपना खून दें, मैं आपको आजादी दूंगा।

” जादू जैसा कमाल दिखाया। यद्यपि विदेशी शासन को उखाड़ फेंकने की कोशिश में सुभाष चन्द्र को तात्कालीन सफलता नहीं मिली, परंतु स्वतंत्रता के जिस बीज को उन्होंने अपने खून से सोचा था, वह आज शान से फल-फूल रहा है। सुभाषचन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी, सन् 1897 को उड़ीसा की राजधानी कटक में हुआ था।

उनके पिता श्री जानकीनाथ बोस कटक के एक प्रमुख वकील थे। उनकी माता का नाम प्रभावती था। वाल्यकाल से हो सुभाष विचित्र स्वभाव के थे । वे अत्यत मेधावी किंतु साथ ही उद्दड विद्यार्थी थे। उन दिनों सब बड़े लोगों की अभिलाषा रहती थी कि उनके लडके अंग्रेज बने, अंग्रेजों की तरह अंग्रेजी बोलें और अंग्रेजों के तौर-तरीके सीखें। इसके अनुसार सुभाष को प्रोटेस्टेट यूरोपियन स्कूल में दाखिल कर दिया गया।

उनके सभी बड़े भाई इस स्कूल में पढ़ चुके थे। इस स्कूल की विशिष्टता यह थी कि वहा के शिक्षक बहुत अच्छे थे। उनमे से कुछ शिक्षकों के साथ सुभाष का संबंध भी मधुर रहा। परंतु गोरे छात्रों के रंग-ढंग सुभाष को अप्रिय लगे। वह उस वातावरण को पसंद नही करते थे, फलतः केवल 8 वर्ष की आयु तक वे इस स्कूल मे रहे। इसके बाद वह रावेनशा कालेज के साथ लगे हुए स्कूल में भर्ती हुए।

सुभाष चंद्र बोस – Subhas Chandra Bose

उन दिनों स्वदेशी आंदोलन की लहरें बंगाल से उड़ीसा मे पहुंच रही थी। उस स्कूल के एक शिक्षक श्री बेनी माधव दास का सुभाष पर बहुत प्रभाव पड़ा, क्योंकि वह आदर्श चरित्र व्यक्ति थे और छात्रों के लिए बडा परिश्रम करते थे। उन्हीं दिनों सुभाष पर स्वामी रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद का प्रभाव पड़ा। सुभाष अपने इस आदर्श शिक्षक तथा विवेकानंद के प्रभाव के कारण निर्धनों के प्रति अत्यंत आकृष्ट हुए।

वह अपने माता-पिता तथा भाइयो से छिपकर निर्धनों के घर जाते और वहां जो कुछ भी सहायता हो सकती करते। जब-जब महामारी, हैजा, चेचक आदि फैलती थी, तो सुभाष छिपकर ऐसे समय मे गाव जाते थे और लोगों की सेवा करते थे। इस उद्देश्य के लिए उन्होंने अपने साथियों की टोली बना ली थी और ये लोग ढूढ़-ढूंढ़ कर लोगों की सेवा किया करते थे I

पर यह अद्भुत बात है कि इस प्रकार बाहर के कार्यों में पर्याप्त समय देने पर भी वह अपनी पढ़ाई की उपेक्षा नहीं करते थे। 1913 में आपने प्रथम श्रेणी में सम्मान सहित मैट्रिक पास किया और छात्रवृत्ति प्राप्त की। परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् वह घर से भागकर चले गये। वह ऐसे गुरु की खोज कर रहे थे, जो उन्हें सही पथ प्रदर्शन करे। कई महीनें इधर-उधर भटकने के पश्चात् वह घर लौट आए।

वह कई साधुओं से मिले, पर उनकी तृप्ति नहीं हुई। तीर्थ यात्रा की चर्चा करते हुए आपने एक बार कहा था, “मुझे कृष्ण का वह रूप जो तीर्थों में पूज्य है, आकपित नही कर पाता। मैं तो कृष्ण के उस रूप का पुजारी हूं जो उन्होंने कुरुक्षेत्र के धर्मयुद्ध में दिखाया था ।”1915 में आपने प्रेसीडेंसी कालेज फलकत्ता से प्रथम श्रेणी मे एफ० ए० पास किया। बी० ए० मे पढ़ते समय एक विशेष घटना घटी।

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प्रेसीडेंसी कालेज के मि० सी० एस० ओटन नामक एक अंग्रेजी के प्रोफेसर थे। उनका आचरण भारतीयों के प्रति अपमानजनक था। उसने भारतीयों के प्रति कुछ अभद्र शब्द कहे। स्वाभिमानी सुभाष उसको सहन न कर सके। उन्होंने अन्य छात्रों से मिलकर ओटन पर हमला कर दिया। मि० ओटन पर आक्रमण करने के कारण सुभाष को कालेज से निष्कासित कर दिया गया।

कई अन्य छात्र भी इस हमले में सम्मिलित थे, पर पूछे जाने पर भी सुभाष ने किसी का नाम नहीं लिया और सब दोष अपने ऊपर ले लिया। फलस्वरूप सुभाष को डेढ वर्ष तक बिना पढ़े समय काटना पड़ा। इस समय वह कटक के छात्रों में सामाजिक सुधार और सांस्कृतिक कार्य करते रहे। सन् 1917 में सर आशुतोष मुखर्जी ने उनका निष्कासन आदेश रद्द किया, तब वह कलकत्ता के स्काटिश चर्च कालेज में भर्ती हुए।

आपने यहां से 1919 मे दर्शनशास्त्र में बी० ए० आनसं प्रथम श्रेणी मे पास किया। सुभाष के मन में एक बेचैनी सो समाई रहती थी। उन्होंने अपने एक मित्र को पत्र लिखकर अपने मन की स्थिति का यों वर्णन किया था-“प्रतिदिन मेरी यह धारणा दृढ़ होती जा रही है कि मुझे अपने जीवन मे एक उच्च और निश्चित उद्देश्य की प्राप्ति करती है। इसके लिए मुझे शरीर और मन को अभी से तैयार करना है।”

सुभाष चंद्र बोस – Subhas Chandra Bose

अपने जीवन का यह महान उद्देश्य अभी तक उनके सामने पूर्णतया स्पष्ट नहीं हुआ था। किंतु यह बात स्पष्ट थी कि जिस दिशा में उनकी शिक्षा दीक्षा हो रही थी, उससे उन्हें संतोष नहीं था पिता उन्हें आई० सी० एस० पास करने की सलाह दे रहे थे। परंतु देश का वातावरण इन सरकारी सम्मानों के विरुद्ध हो रहा था। गांधी जी के असहयोग आंदोलन से देश में विप्लव-सा फैला हुआ था।

जुलियां वाला बाग के भयकर हत्याकांड की गूंज अभी शात नही हुई थी। सुभाष का रक्त भी इन घटनाओं को पढ़कर खौलने लगता था। कभी-कभी वह स्वय इस आग मे कूदने का स्वप्न लेते थे। उनका मन एक अफसर बनकर समस्त जीवन अपने पराधीन देशवासियों की पराधीनता की जंजीरों को और दृढ़ बनाने का नहीं था। फिर भी आप माता-पिता व परिजनों का आग्रह न टाल सके ।

जाते समय आपने कहा था कि “मैं वहा से गुलामी का नही, आजादी का संदेश लेकर लौटूगा ।” विलायत के विलासी जीवन को देखकर आपका मन अपने देश को निर्धनता पर और भी खिन्न होने लगा। वह दिन-प्रतिदिन ब्रिटेन की साम्राज्यशाही के, जो भारत की निर्धनता का मूल कारण थी, पक्के शत्रु बनते जाते थे।

यहां आपने एक स्वतंत्र देश का वातावरण देखा। उन्होंने उसकी अपने देश के वातावरण से तुलना को उनके हृदय में देशभक्ति की ज्वाला और अधिक प्रज्वलित हो उठी। सुभाष जानते थे कि भारत का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है, पर वर्तमान काल में वह दलदल में फसा हुआ है। अतीत गान करने से या प्राचीन में गौरव-गाथा स्मरण मात्र से भारत महान नही हो सकता।

सुभाष चंद्र बोस – Subhas Chandra Bose

महान होने के लिए यह आवश्यक है कि अंग्रेजों की भांति परिश्रम किया जाए। हमे साथ ही यह याद रखना चाहिए कि हमें पराधीन देश को अग्रसर करना है।अगस्त 1920 में वह आई० सी० एस० को परीक्षा में उत्तीर्ण हो गये । परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद आपने घर लिखा, “दुर्भाग्य से में इस परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया हूं। परंतु, मैं अफसर बनूगा या नहीं, यह मैं नहीं कह सकता।

मुझे लगता है कि मैं अपने देश और ब्रिटिश साम्राज्य, दोनों को सेवा एक साथ नहीं कर सकता । शीघ्र ही मुझे इन दोनों में से एक को चुनना होगा।” सुभाष ने भारत मंत्री श्री माण्टेग्यू से साक्षात्कार किया और अपना त्याग पत्र दे दिया । माण्टेग्यू ने, उन्हें पर्याप्त समझाया पर उन पर कोई प्रभाव न हुआ। उन्होंने जो सोच रखा था उससे उन्हें कोई प्रलोभन डिगा न सका।

इंडिया आफिस में सर विलियम ड्यूक सुभाषचन्द्र के पिता के परिचित मित्र थे। उन्होंने आपका त्याग-पत्र अपने पास रखकर आपके पिता को पत्र लिखा। आपके पिता ने सर विलियम ड्यूक के पत्र के उत्तर में लिखा, “मैं अपने पुत्र के इस कार्य को गौरव की दृष्टि से देखता हूं। मैंने उसकी इस शर्त को

मंजूर करके ही उसे विलायत भेजा था।” इस पत्र को प्राप्त करके सर विलियम ड्यूक स्तब्ध रह गए। उन्होंने सुभाष से पूछा, “नौजवान ! तुम अपने भोजन का क्या प्रबंध करोगे ?”

“मैंने बचपन से दो आने रोज में गुजर करने की आदत डाली हुई है। दो आने मैं पैदा कर लूंगा।” सुभाष ने उत्तर दिया । सर विलियम सुभाष का मुंह ताकते रह गए।

सुभाष चंद्र बोस – Subhas Chandra Bose

पिता ने पुत्र को यह लिख भेजा – “जब तुमने देश सेवा करने का फैसला कर लिया है, तो ईश्वर तुम्हें सफलता प्रदान करे।” इस पर सुभाष ने जो उत्तर लिखा, वह भी उन्ही के लायक था। उन्होंने लिखा -“पिताजी, आज मुझे आप पर जितना गर्व हो रहा है, उतना मुझे इससे पहले कभी नहीं हुआ।”

सुभाष ने आराम के जीवन की अपेक्षा देश सेवा के कठोर मार्ग को ही अपने जीवन का मार्ग चुना। उन्होंने शोषित पीडित स्वराष्ट्र की सेवा के कठिन मार्ग का अनुसरण किया। उस समय महात्मा गांधी के नेतृत्व ने देश को नूतन उत्साह और नया कार्यक्रम दिया था। यह नया कार्यक्रम था – अंग्रेजों के साथ असह योग देश के नेतृत्व के लिए गांधी जो के उदय का वर्णन सुभाष ने इस प्रकार किया है सन् 1920 में भारतवर्ष राजनीति के चौराहे पर खड़ा था।

विधानवाद की मृत्यु हो चुकी थी और सशस्त्र क्रांति पागलपन के दौर मे थी। शांति की सहमति असंभय थी। देश आंदोलन की नई विधि और नए नेता की खोज में भटक रहा था। ठीक ऐसे ही समय एक संकल्पवान् व्यक्ति का उदय हुआ और यह व्यक्ति था महात्मा गांधी जो अब तक अपना समय शांति की साधना में लगा रहा था और अपने लिए शक्ति के संचय में लगा हुआ था।

सुभाष चंद्र बोस – Subhas Chandra Bose

वह व्यक्ति स्वयं को जानता था और वह यह भी जानता था कि संघर्ष के इस नये युग में नेतृत्व का ताज उसी के मस्तक पर सुशोभित होगा। विनम्रता के दिखावे ने उसे अभिभूत नही किया उसके स्वर में दृढ़ता थी और लोग उसके झंडे के नीचे थे। गांधी जी के नेतृत्व ने पूर्ण असहयोग की अवस्था में देश को एक वर्ष में स्वराज्य देने की घोषणा की। सपूर्ण देश मे अपूर्व उत्साह की लहर दौड़ गई।

परिणामत: जोश और उत्साह के वातावरण में लोगों ने अपने बड़े-बड़े पद छोड दिए, सम्मानित उपाधियां छोड़ दी, वकीलों ने अपनी वकालत छोड़ दी, विद्याथियों ने स्कूल और कालेज त्याग दिए। कृषको ने मालगुजारी देना बंद कर दिया। समग्र देश में अशांती और असंतोष का वातावरण उपस्थित हो गया।

ऐसे ही देशव्यापी असंतोष और उथल-पुथल के युग में भारतीय राजनीति के मंच पर एक नया नक्षत्र अपने लिए स्थान खोजने में संलग्न था। यह नया सितारा था सुभाषचन्द्र बोस । यौवन के पांव उड-उड कर चलते हैं। जिनके हृदय में उमंग का स्फुरण हो जाता है, उनके पांवों में विद्युत की गति समा जाती है। विद्युत की यह गति सुभाष बाबू के पैरो मे भी देखी गई।

जब ये 16 जुलाई, 1921 को हवाई जहाज से बंबई पहुंचे तो उतरते ही सीधे मणि भवन की ओर चल दिए, जहां उन दिनों गांधी जी ठहरे हुए थे। उन्होंने गांधी जी के सामने अपना हृदय खोलकर रख दिया। उन्होंने विशेष रूप से यह जानना चाहा कि देश को स्वतंत्र कराने के लिए उनकी असहयोग योजना का सही रूप क्या होगा असहयोग का वह सामान्य रूप अंग्रेजों को भारत से निकालने में कैसे सफल हो सकेगा।

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स्पष्टतः सुभाष कार्यक्रम मे और भी उग्रता चाहते थे। वह राजनीति मे अहिंसा का कोई स्थान मानने के लिए तैयार नहीं थे। गांधी जी की राजनीति उन्हें बहुत विचित्र और बेजाने-सी प्रतीत हुई। वह गांधी जी से मिलकर उनके पास से दुःखी और निराश लौटे. किंतु, निराशा का यह कुहरा शीघ्र ही दूर हो गया। उन्हें जो गांधी जी से नही मिला था, वह कलकत्ता मे देशबंधु चितरंजनदास से मिल गया।

श्री दास गांधी जी के आह्वान पर अपनी अच्छी चलती हुई वकालत को छोड़कर देश सेवा के कंटकाकीर्ण मार्ग पर चल पड़े थे। दास साहब को मालूम था कि यह नौजवान आई० सी० एस० को तिनके के समान ठुकरा चुका है। निश्चय ही, यह दो महान आत्माओं का मिलन था। दोनों की यह भेंट ऐतिहासिक सिद्ध हुई। श्री दास ने सुभाष की भावनाओं का आदर किया।

उन्होंने मन में समझ लिया कि उन्हें जैसे कर्मठ सहयोगी की आवश्यकता थी, वह उन्हें मिल गया। सुभाष को भी यह लगा कि जैसे गुरु की खोज उसे थी, यह उसे मिल गया।दास बाबू सुभाष से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने सुभाष को ‘नेशनल कालेज आफ कलकत्ता’ का प्राचार्य बना दिया।

यह कालेज उन विद्यार्थियों के लिए खोला गया था, जिन्हें असहयोग आंदोलन में भाग लेने के लिए राजकीय शिक्षणालयों से निकाल दिया गया था। यहां सुभाष ने अपने अनथक परिश्रम से इन युवकों का बौद्धिक, मानसिक और शारीरिक स्तर ऊचा किया। आपने यहां एक स्वयंसेवक सेना का सूत्रपात किया। इस कार्य को कुशलता से करते हुए वे कांग्रेस के संगठन का अध्ययन भी करते जाते थे।

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वे बंगाल कांग्रेस के संचालन में भी अपनी योग्यता का परिचय दे रहे थे। श्री कालीचरण घोष ने सुभाष की इस क्षमता का वर्णन इस प्रकार किया है I “राष्ट्रीय महाविद्यालय के प्राचार्य के पद पर कार्य करते हुए ही सुभाष बोस ने सर्वप्रथम बंगाल और भारत में कांग्रेस की गतिविधियों में क्रियात्मक भाग लिया।

प्रातःकाल से लेकर काफी रात तक उन्हें कार्यालय, फाइलों और लोगो के समूह से घिरे हुए देखा जा सकता था जो उनका मार्गदर्शन चाहते थे। उनकी शैक्षणिक योग्यता, आई० सी० एस० के विद्यार्थी के रूप में यूरोप में उनका प्रशिक्षण; उनकी अथक कार्यशक्ति, उनका निर्दोष नैतिक चरित्र, उनकी दैहिक भव्यता और उनके खादी के स्वच्छ परिधान, इन सबने मिलकर उनके व्यक्तित्व को अत्यंत आकर्षक और पद के लिए उन्हें सर्वथा उपयुक्त बना दिया था।”

सुभाष को अपने विद्यार्थियों में देश के सुन्दर सपने फलित होते दिखाई दे थे और उन विद्यार्थियों को भी सुभाष के रूप में एक आदर्श हितैषी और मार्गदर्शक के दर्शन होते थे। शीघ्र ही सुभाष के संचालन में राष्ट्रीय कालेज का सुचारु अनुशासन और मनोयोगपूर्ण शिक्षा का उच्चस्तर चर्चा के विषय बन गए।

सार्वजनिक आदोलन में भाग लेने का प्रथम अवसर आपको तब मिला जब 17 नवंबर, 1921 को प्रिंस आफ वेल्स के स्वागत के विरोध में कलकत्ते मे आपने प्रदर्शन का नेतृत्व किया। शासन ने जनता को आदेश दिया था कि वह राजकुमार का भव्य स्वागत करे। नेताओं ने हड़ताल का आह्वान किया। कलकत्ता मे इतने सफल बहिष्कार के पीछे जो अमाधारण मस्तिष्क कार्य कर रहा था वह था सुभाषचन्द्र बोम का।

सुभाष चंद्र बोस – Subhas Chandra Bose

सुभाष बाबू के इस बढ़ते हुए वर्चस्व को देखकर अंग्रेजी सरकार दहल गई। इस प्रदर्शन के अभियोग में सुभाष को छ: महीने का कारावास दंड मिला। यह आपको प्रथम जेल यात्रा थी। जेल से छूटने के बाद सुभाष ने युवक संगठन का कार्य हाथ में लिया। कलकत्ता के आर्यसमाज हाल में ‘अखिल बंगला युवक समारोह का आयोजन किया गया था। सुभाष को इस समारोह की स्वागत समिति का अध्यक्ष बनाया गया था।

उन्होंने अपने स्वागत भाषण मे युवकों को कष्ट उठाकर मातृभूमि की सेवा की प्रेरणा दी। देश की सभी ज्वलंत समस्याओं जैसे स्वदेशी भावना का प्रसार, भावनात्मक एकता, अस्पृश्यता निवारण, सार्वजनिक शिक्षा, समाज-सेवा तथा अनु शासन आदि पर सुभाष ने अपने भाषण में प्रकाश डाला। भाषण इतना ओजस्वी था कि श्रोताओं के मन मोहित हो गये।

युवक संगठन में सुभाष के हाथ उससे ही थे कि बंगाल में भारी बाढ़ आने के कारण हजारों गांव वह गये। भारी मात्रा में जनहानि एवं पशुहानि हुई। कुछ स्वयं सेवको को लेकर आप बाढ-पीड़ितों की सहायता मे लग गये। बाह-पीड़ितों की सहायता पर जाने के पूर्व सुभाष और उनके पिता के मध्य जो वार्तालाप हुआ उसका चित्रण श्री हेमेन्द्रनाथ दास ने इन शब्दों में किया है – “क्या कहा ? तुम जा रहे हो ? अपने गांव कोदलिया में अपने घर मा दुर्गा श्री जानकीनाथ ने मुभाष से पूछा की पूजा होगी और तुम नही होगे। क्या तुम नही सोच सकते कि तुम्हारे बिना मुझे कैसा लगेगा ?”

सुभाष ने कहा- “नही पिताजी ! मैं आपके साथ नहीं जा सकता। आप सब गांव जाकर मां दुर्गा की पूजा करें। मैं तो दीन-दुखियो रूपी वास्तविक मां की पूजा करूंगा।” यह थी सुभाष की धर्म-भावना। कर्तव्य की पूर्ति हो सुभाष के लिए धर्म की साधना थी।

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कुछ दिन बाद जब श्री जानकीनाथ बोस संचार पहुंचे तो वे बाढ-पीडितों के लिए सुभाष द्वारा की गई कुशल व्यवस्था को देखकर आश्चर्यचकित उनके उद्गार थे- “मुझे यह कहते हुए गर्व होता है कि मैं सुभाष का पिता हूं।” उन्हीं दिनों दास बाबू ने ‘स्वराज्य दल’ का संगठन किया विधान सभा मे घुसना चाहिए, इस मत के प्रतिपादक स्वराज्य दल वाले कहलाते थे।

सुभाष बोस इस दल के प्रधानमंत्री थे और इसके मुख्य पत्र ‘फारवर्ड’ के प्रधान संपादक भी। इस कार्य के लिए सुभाष को दिन-रात एक कर देना पड़ा। बडे-बडे अनुभवी पत्र कार भी आपकी योग्यता तथा कार्य कौशल से दंग रह गये। जब स्वराज्य दल ने कलकत्ता निगम के चुनाव में भाग लेने का निश्चय किया तो सुभाष को एकजुट होकर कार्य करना पड़ा। स्वराज्य दल की विजय का श्रेय सुभाष को ही था।

दास बाबू निगम के मेयर बन गए और सुभाष को प्रधान कार्यपालक अधिकारी बनाया गया। उस समय सुभाष की आयु केवल 27 वर्ष थी। इस पद का नियत वेतन 3000 रुपये मासिक था। परंतु आपने पद ग्रहण करते ही अपना वेतन आधा कर दिया। उस वेतन मे से भी वह निर्धन छात्रों, पीडितों एवं दरिद्र व्यक्तियों को सहायता देते थे। आपके प्रबंध ने निगम की व्यवस्था में आमूल परिवर्तन कर दिया।

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सार्वजनिक सडको के नाम बदलकर भारतीय नेताओं के नाम पर रखे गये और स्कूलों में निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य कर दी गयी। वायसरायों को मानपत्र देना बंद हो गया। उनके स्थान पर राष्ट्रीय नेताओं का अभिनंदन किया जाने लगा। सार्वजनिक रूप से कार्य करते हुए भी सुभाष किसी न किसी रूप मे क्रांति कारी दल से सबद्ध रहे।

उन्होंने जो स्वयसेवक दल बनाया था, उसके कुछ लोगो ने एक क्रांतिकारी दल बनाया और सुभाप का उस दल के साथ बराबर संबंध बना रहा। सुभाष की इन विप्लवकारी योजनाओं को ब्रिटिश साम्राज्य के लिए विघातक समझकर सरकार ने उन्हें 25 अक्तूबर, 1924 को गिरफ्तार कर लिया।

गिरफ्तारी के बाद सुभाष पहले कलकत्ता के अलीपुर सेंट्रल जेल में रखे गए। उसके बाद वह वरहमपुर जेल मे रखे गए, जहा क्रांतिकारी नजरबंद रखे जाते थे। तत्पश्चात् उन्हें वर्मा की मांडले जेल में भेजा गया। वह बर्मा जेल में इस कारण भेजे गए कि सरकार समझती थी कि भारत में वह जहां भी रखे जाएंगे वहा से वह बाहर के लोगों के साथ किसी न किसी प्रकार संबंध कर लेंगे।

मांडले की जेल उन दिनो धरती पर साक्षात् नरक का उदाहरण थी। यहां पर आकर आपका स्वास्थ्य गिरने लगा और फिर वह बराबर बिगड़ता ही चला गया। डॉक्टरो की चेतावनी पर सरकार ने उन्हें उपचार के लिए स्वीट्जरलैंड जाने शर्त पर छोड़ना चाहा | सुभाष ने शर्त मानने से मना कर दिया। विवश होकर सरकार को बिना शर्त छोडना पड़ा।

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16 मई, 1927 को तीन वर्ष के कठोर कारावास के बाद आप मुक्त हुए। सुभाष के जेलवास में ही दास बाबू की मृत्यु हो चुकी थी। जब वे छूटे, तो उन पर बंगाल के नेतृत्व का पूर्ण भार पड गया। उन्हीं दिनों साइमन कमीशन के भारत आगमन का बायकाट आंदोलन चल पडा था। सुभाप ने स्थान-स्थान पर प्रचार कार्य आरंभ किया। वह बराबर पूर्ण स्वराज्य का प्रचार कर रहे थे ।

सुभाष समझौता-पसंद मनोवृत्ति के विरुद्ध थे। कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन मे जब शासन कार्य में सहयोग देने का प्रभाव नेहरू-रिपोर्ट के रूप में आया तो सुभाष ने कठोर शब्दो में उसका विरोध किया। सुभाष स्वभाव से विद्रोही और प्रगतिवादी थे। अधिकारो की भिक्षा मांगने और झुकने की नीति से वे कभी सहमत नहीं हुए।

गांधी जी से मतभेद होते हुए भी आप उनके नेतृत्व में चलाये गये सब आंदोलनों में सक्रिय भाग लेते रहे। 21 अप्रैल, 1930 को दूसरे नेताओं के साथ आप भी जेल गए। उन दिनों अलीपुर केंद्रीय जेल में क्रांतिकारियों के साथ दुरव्यवहार हो रहा था। सुभाष के विरोध करने पर जेल के पठान वार्डरो ने आप पर लाठी प्रहार किया। इससे आप कई घंटे मूच्छित रहे।

वह सजा पूरी करके छूटे ही थे कि 26 जनवरी, 1931 को एक जुलूस का नेतृत्व करते हुए पुनः गिरफ्तार हुए। 1932 में वह बंबई से लौट रहे थे कि गिरफ्तार कर लिए गए और मार्च 1933 तक नजरबंद रहे। इस प्रकार लगातार जेल में रहते हुए आपका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया। सरकार ने आपको उपचार हेतु यूरोप जाने की अनुमति दे दी।

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1935-1936 में आपने यूरोप के अनेक देशों का भ्रमण किया। विदेशों मे भ्रमण करते हुए भी आप भारतीय स्वतंत्रता के अनुकूल वातावरण बनाते रहे। वे जर्मनी, बलिन, रोम, पेरू, वारमा, इस्तम्बूल, बेलग्रेड और बुखारेस्त आदि स्थानो पर गये। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘इंडियन स्टूगिल’ प्रकाशित कराई।

उनका विचार था – “भारत को भौतिक और सामाजिक पुननिर्माण की आवश्यकता है और उसके लिए एक तानाशाह का शासन होना चाहिए तभी भारतवर्ष में सुधार संभव है। ऐसे दल की सरकार हो जो सैनिक अनुशासन के बंधन से बंधी हो ।” 1938 में 41 वर्ष की आयु मे सुभाष हरिपुर कांग्रेस के अध्यक्ष नियुक्त हुए उनकी गिनती अब देश के बड़े नेताओं में होने लगी थी।

विदेशों में वह गांधी और जवाहरलाल के बाद सर्वाधिक प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ माने जाते थे । उन्होंने कांग्रेस को शक्ति दो और उसमें एकता लाने का प्रयास किया। महात्मा गांधी की इच्छा के विरुद्ध सुभाष त्रिपुरी कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। तब गांधी जी ने कांग्रेस छोड़ देने को इच्छा प्रकट की। सुभाष यह नहीं चाहते थे कि उनके कारण गांधी जी को काग्रेस से बाहर जाना पड़े। इसलिए वह स्वयं कांग्रेस से पृथक हो गये।

उन्होंने बाहर आकर ‘फारवर्ड चलाक’ का संगठन किया। उनमे अदम्य देशभक्ति की जो भावना थी, उसने अपना भिन्न रास्ता खोज लिया 1939 के सितंबर में द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ हो चुका था । सुभाष ने बहुत पहले ही कहा था कि हमे लाभ उठाकर अंग्रेज सरकार का तख्ता उलटने की तैयारी करनी चाहिए । महायुद्ध छिउने पर कांग्रेस ने तत्काल कुछ नही किया।

सुभाष चंद्र बोस – Subhas Chandra Bose

उसने केवल अपने मंत्रिमडलो को इस्तीफा देने के लिए कह दिया। मार्च 1940 में रामगढ़ में कांग्रेस अधिवेशन हुआ। सुभाष ने रामगढ मे समझौता विरोधी सम्मेलन किया, जो बहुत सफल रहा।

सुभाष बाबू अपने लक्ष्यों के लिए एक दृढ-संकल्प क्रांतिकारी तो थे, किंतु लक्ष्य प्राप्ति की प्रक्रिया के संबंध में दुराग्रही नही थे। उनकी दृष्टि मे सफलता के लिए संगठन अनिवार्य रूप से आवश्यक था और अनुशासित एकता हो लक्ष्य तक पहुंचाने वाला मार्ग थी । किसी निश्चित समय में किसी एक तरीके का महत्व वे आंतरिक तथा अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के संदर्भ मे आकते थे।

द्वितीय महा युद्ध के समय देश तथा विदेश में उनकी इस नीति और दाव-पेच का सम्यक् प्रमाण मिला। सुभाष ने हालवेल स्मारक के संबंध में सत्याग्रह शुरू कर दिया। वह भारत रक्षा कानून के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिए गए। ऐसे स्वर्णिम अवसर को आप जेल के सीखचों में बद रहकर नही व्यतीत करना चाहते थे। अतएव आपने जेल मे आमरण उपवास की घोषणा कर दी।

सरकार ने भयभीत होकर उन्हें घर मे नगरबंद कर दिया। सुभाष की यह अंतिम जेल-यात्रा थी, क्योंकि इसके पश्चात् वह अपने देश से पलायन कर गए। सुभाष संकट के समय भारतवर्ष से बाहर जाने को क्यों विवश हुए इस संबंध मे उनका कहना था कि “अंग्रेज भारत को तब तक स्वतंत्र नही कर सकता जब तक हिंसात्मक क्राति नही की जाएगी। अंग्रेजों ने किसी भी देश को सरलता से स्वतंत्र नहीं किया।

सुभाष चंद्र बोस – Subhas Chandra Bose

युद्ध के समय भारत की जेल में सड़ने से यह अच्छा है कि में विदेश में रहकर अपने देश के लिए कुछ करू। मुझे ईश्वर में विश्वास है। मैं समझता हू कि भारत के लोग अपनी राजनीतिक भूलों के कारण परेशानी भुगत रहे हैं और इसका केवल यही उपचार है कि हम अपनी स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए विदेशी सहायता प्राप्त करें।

मुझे भारत का भविष्य दिखाई पड रहा है और हम भारत माता की रक्षा करने के लिए रक्त की प्रत्येक बूंद बहा देंगे।” सुभाष पेशावर एवं काबुल होते हुए सकुशल बलिन पहुंच गए। वह जर्मन पहुचकर हिटलर से मिले अग्रेज सरकार को उनके जर्मनी पहुंचने का समाचार उस समय मिला जब अचानक एक दिन जर्मन रेडियो से सुभाष की सिंहगर्जना मुनाई दी — “हमे अपनी स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए अंग्रेजों से समझौता नहीं करना है।

हमें स्वतंत्रता के लिए भीतर और बाहर दोनों मोर्चों पर लड़ना है। हमे अपना संघर्ष जारी रखना है और हम अपना उद्देश्य प्राप्त करने रहेगे।” जापान से एक भारतीय क्रांतिकारी रासबिहारी बोस का निमंत्रण पाकर आप वहा चल दिये। सुभाष के वहा पहुंचते हो सारे पूर्वी एशिया के भारतीयों मे एक सनसनी फैल गयी। उनके दर्शन से प्रवासी भारतीयों में अदम्य विश्वास उत्पन्न हुआ ।

वहा आजाद हिंद फौज लगभग समाप्त हो चुकी थी। सन् 1943 मे एक समारोह मे रासबिहारी बोस ने भाषण देते हुए कहा “मैं वूढा हो गया हूं. यह एक मुझसे अधिक जवान व्यक्ति का काम है और सुभाषचन्द्र बोस सौभाग्य से भारत मे जो कुछ भी श्रेष्ठ है, उसका प्रतिनिधित्व करते हैं। मैं आज आजाद हिंद फौज का मुख्य सेनापतित्व सुभाषबाबू को सौंपता हूं।”

सुभाष चंद्र बोस – Subhas Chandra Bose

सुभाष ने वन्दी भारतीय सैनिकों तथा प्रवासी भारतीयों को एक सुसंगठित सेना बनाई। उसकी प्रार्थना पर प्रवासी भारतीयों ने तन, मन एवं धन से साथ दिया। लाखों रुपये चंदे में आने लगे। एक मुसलमान व्यापारी ने लगभग एक करोड़ रुपये की सम्पत्ति नकद और हीरे आदि दिए और स्वयं बिल्कुल भिखारी हो गया। इनका जोशीला भाषण सुनकर कई भारतीयों ने अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया।

उनके भाषण का एक अंश पठनीय है- “प्रथम विश्व युद्ध से ब्रिटिश राजनीतिज्ञ हम लोगों को धोखा देते चले आ रहे हैं। पर अब हम उसे सहन नही कर सकते। बहुत समय से हम लोग अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते चले आ रहे हैं। अंग्रेजी साम्राज्यवाद ने हमारे सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक ढांचे को नष्ट कर दिया है।

हम जानते हैं कि स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए इस समय जितना अच्छा अवसर है वह आगे सौ वर्षों मे भी न आयेगा। यह हमारा कर्तव्य है कि हम स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए रक्त दें। यदि हम स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए त्याग करें तो हम उसे स्थिर भी रख सकेंगे। शत्रु ने तलवार निकाली है अतः हमें भी अब तलवार से लडना पड़ेगा। असहयोग आंदोलन को अब हमें सशस्त्र लड़ाई में बदल देना है।”

सुभाष चंद्र बोस – Subhas Chandra Bose

आजाद हिंद सेना का इतिहास भारत की स्वतंत्रता के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जायेगा। इससे पूर्व कभी भारत की स्वाधीनता के लिए सेना का इतना संगठन नहीं किया गया था। अंग्रेज सेना जब मलाया से भागी तो मलाया में सात लाख हिन्दुस्तानी थे। अंग्रेज अफसर इन हिन्दुस्तानी नागरिको को अरक्षित अवस्था में छोड़कर भाग गये थे। इन नागरिकों में से बहुत से जवान आजाद हिंद सेना में भर्ती हो गये ।

आजाद हिंद सेना का झंडा तिरंगा ही था ‘जयहिंद’ इसकी सलामी थी। हिंदू या मुसलमान सब परस्पर ‘जयहिंद’ कहकर भेंट करते थे सब सैनिक एक साथ भोजन करते थे। इस संगठन की भाषा हिंदुस्तानी और लिपि रोमन थी। जो लोग इस सेना में प्रवेश होते थे, उन्हें निम्नलिखित प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर करने पड़ते थे।

“मैं स्वयं आजाद हिंद सेना में भर्ती होता हूं। भारत की स्वतंत्रता के लिए तन, मन, धन न्यौछावर कर देने की दृढ प्रतिशा करता हूं। भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की बाजी लगाने को भी तैयार हूं में स्वार्थ को छोड़कर घृणा, बदले और हिंसा की भावना नही जगती वह जाति इसी योग्य है कि परतंत्र बनी रहे।”

भारतवर्ष में स्वतंत्रता के लिए जो लड़ाई लड़ी जा रही थी उससे अंग्रेजो को हटाना संभव न था। विदेशी सहायता से ही ऐसा संभव था। सुभाषचन्द्र का लक्ष्य था तीन लाख की सेना और 30 करोड़ डालर मुद्रा का प्रबंध करना। वे बर्मा के स्वतंत्रता समारोह में भाग लेने रंगून गये। रंगून के प्रसिद्ध जुबली हाल में उनका भाषण हुआ। हाल ठसाठस भरा हुआ था। लोग अपने प्रिय नेता सुभाष को प्रतीक्षा कर रहे थे।

सुभाष चंद्र बोस – Subhas Chandra Bose

उनके आते हो आकाश ‘जयहिंद’ और ‘नेताजी जिंदाबाद’ के नारों से गूंज उठा। सुभाष का वह ऐतिहासिक भाषण आज भी स्मरणीय है “स्वतंत्रता बलिदान चाहती है। उसके लिए सब कुछ देना है। आजादी के लिए बहुत त्याग किया है, किंतु अभी प्राणो की आहुति देना शेष है। आजादी को आज अपने शीश-फूल चढ़ा देने वाले पागल पुजारियों को आवश्यकता है।

हमे ऐसे नवयुवको की आवश्यकता है जो अपने हाथों से अपना सिर काटकर स्वाधीनता देवी को भेंट चढ़ा सकें। आप मुझे अपना खून दें, मैं आपको आजादी दूगा।” हाल में सन्नाटा छा गया। लोगों के हृदय जोश से भर गये। सहसा हाल में कई नौजवानों ने कहा – “हम ! अपना खून देंगे।”

इतनी भीड़ को चोरते हुए 17 कुमारियां आगे बढ़ी और उन्होंने अपनी कमर से छुरियाँ निकालकर अपनी अंगुली पर घाव किया और रक्त बिंदुओ से स्वतंत्रता के प्रतिज्ञापत्र पर हस्ताक्षर किये। आजाद हिंद सेना के सैनिकों ने सुभाष के साथ हिंदुस्तान की मिट्टी को हाथ मे लेकर यह प्रण किया कि “जब तक हिंदुस्तान स्वतंत्र नहीं होगा, हम पीछे नहीं हटेंगे।”

अपनी मातृभूमि की ओर निरंतर बढ़ते हुए आजाद हिंद फौज ने वर्मा की सीमा पार कर 18 मार्च 1944 को भारत की धरती पर पैर रखे। सैनिको को अपनी जन्मभूमि का दर्शन करके असीम प्रसन्नता हुई। उन्होंने प्रेम-विह्वल होकर भारतमाता की मिट्टी को चूमा। वह बहादुर सेना तब कोहिमा और इंफाल की ओर बढी ।

सुभाष चंद्र बोस – Subhas Chandra Bose

डेढ़ वर्ष तक लड़ाई होती रही। सहस्रो सैनिकों ने प्राणों की आहुति दो। ‘जयहिंद’ और ‘नेताजी जिंदाबाद’ के गगनभेदी नारों के साथ स्वतंत्र भारत का झंडा वहां फहराया गया। परंतु हिरोशिमा और नागासाकी पर अमरीकी बम वर्षा ने जापान को हथियार डालने पर मजबूर कर दिया। साथ ही वर्षा के रूप में प्रकृति ने ऐसा भयानक रूप ग्रहण किया कि अन्त मे आजाद हिंद सेना को पोछे हटना पड़ा।

बाद में आजाद हिंद सेना के सिपाही कैद कर लिये गये। इन सैनिकों को दिल्ली के लाल किले तथा अन्य स्थानों पर बंदी बनाकर मुकदमे चलाये गए। मुकदमे से भारत में जनमत तैयार हुआ जनता मे जोश उमड़ा। ब्रिटिश फौज मे जो भारतीय थे, उनमें बहुत जोश फैला। सरकार सावधान हो गई। उन्हें नाममात्र सजाएं दी गईं।

रंगून पर अंग्रेजों का पुनः कब्जा होने से पूर्व ही सुभाष बाबू हवाई जहाज से जापान के लिए रवाना हो गये थे। वह हवाई जहाज दुर्घटना का शिकार हो गया। जहाज को आग लगी, वह अग्नि ही भारत के सहस्रो युवको के हृदय सम्राट् बोस की चिता बन गयी। स्वतंत्रता के दीवाने ने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते हुए प्राण त्याग दिये। मृत्यु के कुछ समय पहले उन्होंने अपने साथी से कहा

“हबीब, में अनुभव कर रहा हू कि शीघ्र ही मैं मर जाऊगा । मै भारत की स्वतंत्रता के लिए अत तक लड़ता रहा। गेरे देशवासियों से कहना कि भारत शीघ्र स्वतंत्र हो जाएगा। स्वतंत्र भारत चिरंजीवी हो । जयहिंद ।” 18 अगस्त 1945 को उन्होंने अपना नश्वर शरीर त्याग दिया। निर्भय योद्धा, कर्मवादी दार्शनिक और विलक्षण राजनीतिज्ञ नेताजी उस समय 50 वर्ष के भी नहीं थे।

सुभाष चंद्र बोस – Subhas Chandra Bose

उनके पार्थिव शरीर से निरंतर उनकी वाणी गूज रही थी “पराधीन रहना पाप है। इससे अधिक क्या कि उन्होंने अपने अनुगामियों में ही यही आग प्रज्ज्वलित की, जिससे प्रेरित होकर वे उनको उपस्थिति में सभी भेदभाव भूल गए थे और एकसूत्र होकर काम करते थे ।” निष्कर्ष यह है कि सुभाषचन्द्र बोस भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अद्भुत सेनानी, अप्रतिम योद्धा और भारतमाता के अनन्य भक्त थे। वे एक महान क्राति कारी नेता थे।

उन्होने अपने आराम और सुरक्षा की कभी परवाह नहीं की और अपना समस्त जीवन देश की मुक्ति के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने देश के लिए जो महान त्याग किया वह भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास में स्वर्णाक्षरो मे लिखा जाएगा । 

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