लाल बहादुर शास्त्री – Lal Bahadur Shastri

लाल-बहादुर-शास्त्रीलाल बहादुर शास्त्री

यह मात्र संयोग था अथवा ईश्वर की हो इच्छा थी कि भारत के दो महान स्वतंत्रता सेनानियों, महात्मा गांधी और लालबहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्तूबर को हुआ था। दोनों मे अनेक समानताएं है। दोनों सादा जीवन और उच्च विचार में विश्वास रखते थे। दोनों अहिंसा और समझौते की नीति के प्रबल समर्थक थे। दोनों के रास्ते सत्य पर आधारित थे। दोनो के हृदय कोमल से कोमलतम तथा कठोर से कठोरतम थे। अतः विजयश्री दोनों को मिली।

लाल बहादुर शास्त्री – Lal Bahadur Shastri

“हम रहें या न रहें, लेकिन यह झंडा रहना चाहिए और देश रहना चाहिए और मुझे विश्वास है कि यह झंडा रहेगा; हम और आप रहें, या न रहें लेकिन भारत का सिर ऊचा होगा। भारत दुनिया के देशों में एक बड़ा देश होगा और शायद भारत दुनिया को कुछ दे भी सके ।”

ये उद्गार हैं उस स्वतंत्रता सेनानी लालबहादुर शास्त्री के I व्यवसाय से वे शिक्षक थे। उत्तर प्रदेश सरकार के राजस्व विभाग में क्लर्क के पद पर भी उन्होंने कार्य किया था। लालबहादुर अभी डेढ़ वर्ष के ही थे कि पिता का देहावसान हो गया। माता रामदुलारी देवी के लिए नन्हें लालबहादुर ही एकमात्र आश्रय था। माता ने उन्हें आदर्श बालक बनाने का भरसक प्रयत्न किया। बचपन के संस्कार ही भविष्य के जीवन का आधार बनते हैं। वे संस्कार उन्हें अपने ननिहाल में प्राप्त हुए।

पिता की मृत्यु के पश्चात् इनकी माता अपने पिता के घर चली गई। लालबहादुर को भाई-भतीजो, नाती-पोतों और नातिनों-पोतियों से भरा परिवार मिला। शास्त्री जी का स्वयं का कथन है कि उनके पिता जीवित होते तो भी संभवतः उन्हें इतना प्यार न करें पाते। इस प्रकार छठी कक्षा तक शिक्षा आपने नाना के घर ही प्राप्त की। छठी कक्षा के बाद आगे की शिक्षा के लिए आप अपने मौसा रघुनाथ प्रसाद के यहां बनारस चले गए।

लाल बहादुर शास्त्री – Lal Bahadur Shastri

वे एक आदर्श गृहस्थ थे जिनका जीवन निष्काम कर्म का श्रेष्ठ उदाहरण था। इन दिनो बनारस में प्राच्य विद्याओ का दौर चल रहा था। घर-घर में योग-साधना, तपश्चर्या और दार्शनिक उपलब्धियां प्राप्त करने की ओर झुकाव था। लालबहादुर के जीवन पर इन सब परिस्थितियों का प्रभाव पड़ा। उनके जीवन में सादगी एवं अपरिग्रह-साधना संभवतः इसी वातावरण की देन है।

लालबहादुर पढ़ाई में सामान्य छात्र थे। किंतु उनके मानसिक क्षितिज पर गुरु कृपा से एक दूसरी ही दुनिया का उदय हो रहा था। स्वराज्य प्राप्ति की आवाजें देश के कोने-कोने मे उठ रही थी। लालबहादुर उस समय के बड़े नेताओ के भाषणों का पारायण करता देशभक्ति की भावना उसके हृदय मे हिलोर पैदा कर देती।

महात्मा गांधी के आगमन से स्वाधीनता आदोलन का स्वर बदल गया। लालबहादुर को उनके दर्शन करने का तब सौभाग्य प्राप्त हुआ जब वे सन् 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के उद्घाटन के अवसर पर बनारस पधारे। गांधी जी ने ब्रिटिश सरकार और भारतीय महाराजाओं के विरुद्ध खरा भाषण दिया। उनके भाषण को सुनकर बड़े-बडे राजे-महाराजे सभा भवन छोड़कर चले गए थे।

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Pandit Jawaharlal Nehru – पंडित जवाहरलाल नेहरू

श्रीमती एनी बेसेंट ने गाधी जी के कठोर भाषण के प्रति क्षोभ प्रकट किया था, लेकिन जनता मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुनती रही थी । लालबहादुर उनकी इस रोमांचकारी निर्भीकता से अत्यत प्रभावित हुआ था। उसके कोमल मानस पर गांधी जी के तेजोमय व्यक्तित्व का प्रभाव पड़ा। इससे उसका मन वृढ और सकल्पशील होता जा रहा था। उसने अपने भावी जीवन को सभवतः इसी समय से ढालना शुरू कर दिया था। सत्याग्रह आंदोलन में भाग लेने के लिए जब उसने अध्ययन छोड़ा तो बडी श्रद्धा के साथ उसके सहपाठियों ने उसकी अभ्यर्थना की।

असहयोग आदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें पुलिस पकड़कर थाने ले गयी। पूछताछ करके उन्हें छोड़ दिया गया। वह असमंजस मे थे कि फिर आंदोलन में कूद पडें अथवा पुनः विद्यारंभ करें। इसी समय उनकी भेंट सुप्रसिद्ध दार्शनिक डॉ. भगवानदास से हुई। उन्होंने परामर्श दिया कि वे काशी विद्यापीठ में दाखिल हो जाएं और अपने अधूरे अध्ययन को पूरा करके भविष्य का कार्यक्रम निर्धारित करें।

1920 में गांधी जी के आंदोलन में सम्मिलित होने के बाद लालबहादुर में एक नयी प्रतिमा का उदय दिखायी देता है। ऐसा प्रतीत होता कि उस समय उन्होंने निश्चय कर लिया था कि बिना किसी के भरोसे अपने ही बल पर वह अपने जीवन को सफल बनायेंगे । 1923 में गया कांग्रेस का अधिवेशन था। विद्यापीठ के कुछ अन्य छात्रों के साथ लालबहादुर भी कांग्रेस का काम करने के लिए वहां गए। उन्होंने बड़े उत्साह से मिट्टी खोदने और ढोने का काम किया और पंडाल बनाकर तैयार कर दिया।

लाल बहादुर शास्त्री – Lal Bahadur Shastri

गांधी जी के नेतृत्व में देश आगे बढ़ा। सन् 1930 और 1932 के आंदोलनों में लालबहादुर कई बार जेल गए। उनकी पत्नी ललिता जी उस समय काफी बीमार रहा करती थी। डाक्टरों को सदेह था कि उन्हें टी. बी. हो गया है। लेकिन लालबहादुर जी ने कभी यह नहीं सोचा कि जेल न जाकर उन्हें अपनी पत्नी की देखभाल करनी चाहिए। वे जेल से छूटते ही पुनः जेल चले गए।

1935 में लालबहादुर जी उत्तर प्रदेश कांग्रेस के मंत्री चुने गए। उन्हें लखनऊ मे आकर काम करना पड़ा। वहां वे अपने मित्र त्रिभुवन नारायण सिंह के घर पर रहते रहे। वहां वे प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के दफ्तर से लौटने के बाद भी देर रात तक काम करते रहते थे। पता नही इतने नन्हे से शरीर में इतनी शक्ति कहां से आ गयी थी। 

8 अगस्त 1942 को ‘भारत छोडो’ प्रस्ताव स्वीकार किया गया और देश व्यापी आंदोलन छिड़ गया। ‘करो या मरो’ का नारा गांधी जी ने भारत को दिया। बड़े नेताओ की गिरफ्तारी के बाद देशव्यापी गुरिल्ला युद्ध छिड़ गया इस मुक्ति-सग्राम मे शास्त्री जी ‘करो या मरो’ के नारे को चरितार्थ कर रहे थे। बंबई अधिवेशन से वे यू. पी. के जत्थे के साथ वापस आए।

लाल बहादुर शास्त्री – Lal Bahadur Shastri

पुलिस उनको गिरफ्तार करने की खोज मे थी। वे पुलिस के चंगुल से बचने के लिए इलाहाबाद स्टेशन पर न उतरकर नैनी स्टेशन पर ही उतर गए थे। उनके साथियों ने उन्हें प्लेटफार्म रेलिंग के पार उतार दिया। इसके बाद उन्होंने भूमिगत जीवन व्यतीत करना शुरू कर दिया। 1930 से 1945 तक के 15 वर्षों मे से शास्त्री जी के जीवन के 9 वर्ष का समय जेल में ही गुजरा।

जेल जीवन में भी उन्होंने सदैव एक आदर्श सत्याग्रही होने का परिचय दिया। जेल जीवन में ही उन्होंने कांट, हीगेल, हेरोल्ड लास्की, बटू ड रसेल, आल्डूअस हक्सले और मावसं-लेनिन का अध्ययन किया । वस्तुतः जेल मे ही उन्हें एक आत्मानुशासित, साहसी और तपस्वी व्यक्ति के रूप में निखरने का अवसर मिला।

अपने व्यक्तिगत सुख-सुविधा के बड़े से बड़े मोह से सहज मुक्त होना इस सत्याग्रही के लिए सर्वथा सामान्य बात थी । एक बार जब वे नंनी जेल मे थे, उनकी पुत्री के सख्त ज्वरपीड़ित होने का समाचार आया। उनके पैरोल पर रिहा होने की बात उठी। रिहाई के लिए जेल अधिकारियो को यह लिखित आश्वासन देना पड़ता था कि बदी किसी आंदोलन में भाग नहीं लेगा।

लाल बहादुर शास्त्री – Lal Bahadur Shastri

यद्यपि लालबहादुर का किसी आदोलन में सम्मिलित होने का कोई विचार नहीं था, तथापि उन्होंने कोई लिखित आश्वासन देने से स्पष्ट मना कर दिया। किंतु आत्म सम्मानी शास्त्री के मनस्वी एवं सच्चे जीवन का परिचय जेलर को था । अंततः अधिकारियों ने बिना किसी शर्त के उन्हें 15 दिन के लिए रिहा कर दिया।

शास्त्री जी घर पहुचे, तब तक उनकी पुत्री चल बसी थी। उन्हें अपने जेल जीवन में पुरुषोत्तमदास टंडन के साथ रहने का भी सौभाग्य मिला, जिन्होंने अपरिग्रह और स्वाभिमान को भारतीय राजनीतिक जीवन में प्रतिष्ठित किया था। उन्हें जवाहरलाल नेहरू के साथ भी कारावास में रहने का अवसर प्राप्त हुआ, जिनका व्यक्तित्व कांच के समान पारदर्शी था।

शास्त्री जी कुशल प्रशासक थे। प्रशासन का प्रारंभिक अनुभव उन्हें 1947 मे उस समय हुआ जबकि वे उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री गोविन्द वल्लभ पंत के सभा-सचिव नियुक्त हुए। उनको योग्यता और कार्यकुशलता से प्रभावित होकर पंत जी ने उन्हें शीघ्र ही पदोन्नति पर परिवहन तथा गृहमंत्री बना दिया। पंडित पंत कांग्रेस संस्था और प्रशासन में नए रक्त का संचार करना चाहते थे।

लाल बहादुर शास्त्री – Lal Bahadur Shastri

वे यह चाहते थे कि नौजवान कार्यकर्ता प्रशासन मे आएं, प्रशिक्षण प्राप्त करें और महत्त्वपूर्ण पदों पर काम करें। पं. पंत व्यक्तियों के भारी पारखी थे। उन्हें यह अवसर मिला कि निकट से इस उभरते व्यक्तित्व का अध्ययन कर सकें। पंत जी ने शास्त्री जी को उत्तर प्रदेश के पुलिस एवं यातायात मंत्री के पद पर नियुक्त किया। राजनीतिक जीवन में इसे शास्त्री जी की उन्नति ही माना जाएगा।

काम चाहे जितना कठिन क्यों न हो उसके अनुरूप ऊचा उठने की असाधारण श्रम-साधना से शास्त्री जी सदैव संपन्न रहे। उत्तर प्रदेश का पुलिस विभाग अंग्रेज सरकार के भक्तों से भरा पड़ा था। मुस्लिम लीग के प्रभाव के कारण कुछ साप्रदायिक मनोवृत्ति वाले अफसर भी पुलिस में थे। वे दिन सांप्रदायिक दंगो के थे। किसी भी मंत्री के लिए इस स्थिति में सतुलित रहना कठिन था।

शास्त्री जी ने प्रांतीय रक्षा दल का व्यापक संगठन किया। इस दल का कार्य सांप्रदायिक झगड़ो को शांत करने में पुलिस तथा गैर-सरकारी संगठनो की सहायता करना था। आगे चलकर यह दल समाज-विरोधी आचरण करने वाले तत्त्वों को समाप्त करने में प्रशासन का सहायक बना। शास्त्री जी ने अनेक जेल यात्रियों को इस रक्षा दल में भर्ती करके उन्हें ऊंचे पदो पर स्थापित किया।

परिवहन मंत्री के रूप में उनके सुधारों को अत्यंत प्रगतिशील माना जाता है। शास्त्री जी ने बसों में महिलाओं को बस कंडक्टरी के स्थान पर नियुक्त किया। उनके आदेश को देखकर सरकार और जनता दोनो आश्चर्यचकित रह गए। वस्तुतः शास्त्री जी को लोगों को सहसा चकित कर देने का अभ्यास पुराना था। सन् 1952 में नेहरू सरकार के सदस्य होने के बाद वे काग्रेस और भारत सरकार के समन्वय एवं समाधानकर्ता और समझौता कराने वाले बन गए।

लाल बहादुर शास्त्री – Lal Bahadur Shastri

नेहरू जी के शब्दों में उच्चतम व्यक्तित्व वाले, निरंतर सजग और कठोर श्रम शील व्यक्ति का नाम है लालबहादुर शास्त्री ।” रेल मंत्री के रूप में शास्त्री जी ने अनेक उल्लेखनीय कार्य किए। विभाजन के पश्चात् रेल यातायात व्यवस्था प्रायः छिन्न-भिन्न हो गई थी। रेल यातायात की अविश्वसनीयता के कारण सड़क यातायात के प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ रहा था।

जनता में रेलवे की त्रुटिपूर्ण कार्य प्रणाली के प्रति बढ़ते हुए असंतोष को दूर करने के लिए उन्होंने रेलवे प्रयोक्ता सलाहकार समितियो का आंचलिक और डिवीजनल आधार पर सगठन किया। केंद्र मे एक राष्ट्रीय रेलवे प्रयोक्ता सलाहकार समिति की स्थापना की। इस पद्धति से व्यापारिक जगत मे रेल यातायात के लिए पुनः विश्वास की भावना में वृद्धि हुई।

रेल भाड़े के पूरे ढांचे का अध्ययन करके उचित परामर्श देने के लिए उन्होंने रामास्वामी मुदालियर समिति का निर्माण किया । शास्त्री जी के मंत्रित्वकाल मे चितरजन कारखाने के उत्पादन में लगभग अस्सी प्रतिशत की वृद्धि हुई प्रतिवर्ष इस कारखाने में दो सौ इजिनों का उत्पादन होने लगा। शास्त्री जी की अपनी विशेषता यह थी कि उनके कार्यो मे जन-सामान्य के हितों की उपेक्षा नही होती थी। उनके मंत्रित्वकाल में तीसरे दर्जे के यात्रियों के लिए सुविधाओं में पर्याप्त वृद्धि हुई।

लाल बहादुर शास्त्री – Lal Bahadur Shastri

राजनीति में लालबहादुर शास्त्री बड़ी सूझ-बूझ से काम लेते थे। राजनीतिक उलझनें उन्हें कभी विचलित न कर सकी। काम-काज के सूक्ष्मतम विवरणों पर उनकी सूक्ष्म पकड़ होती थी। वे किसी भी समस्या की जड में बैठकर उसका समाधान निकाल लेते थे। बड़े-बड़े अधिकारी उनकी बुद्धिमत्ता और कार्यकुशलता को देखकर आश्चर्यचकित रह जाते थे।

कितनी ही गुत्थियों को उन्होंने अपने ढंग से सुलझाया और बडे-बड़े संकटों का हंसते-हसते सामना किया। वस्तुतः वे अजातशत्रु थे; उनका कोई विरोधी नही था अपनी कर्तव्यनिष्ठा और सादगी के कारण उन्होंने भारत के प्रत्येक वर्ग का मन मोह लिया था। वे सत्य और अहिंसा में विश्वास करते थे और उनकी लौकिक इच्छाए बहुत सीमित थी।

वे अपना काम नम्रता और खामोशी से करते थे। अपने सिद्धांत और राष्ट्रहित को तनिक भी क्षति पहुंचाए बिना समन्वय वृत्ति से मध्य का रास्ता निकालने की सबसे कठिन फला उन्होंने अपना ली थी। काश्मीर का मामला हो या दक्षिण भारत हिंदी का समस्याग्रस्त प्रश्न हो, मिजाज खोए बिना बीच का मार्ग ढूंढ निकालना और दृढता मे उस मार्ग पर चलना लालबहादुर काम था।

लाल बहादुर शास्त्री – Lal Bahadur Shastri

नेहरू जी जब अस्वस्थ हुए तो उन्होंने शास्त्री जी को निविभागीय मंत्री के पद पर नियुक्त कर अपना विश्वासपात्र बनाया। उनका काम था कि वे विदेश मंत्रालय, अणुशक्ति विभाग और मंत्रिमंडलीय सचिवालय से प्रधानमंत्री के पास आने वाले कागजात को संभालेंगे। आवश्यक होने पर वे प्रधानमंत्री के आदेश प्राप्त करेंगे।

फिर यह समस्या आई कि “नेहरू के बाद कौन ?” उनके आकस्मिक निधन के बाद अंततः 9 जून, सन् 1964 को प्रधानमंत्री पद लालबहादुर शास्त्री ने ग्रहण किया। दैवयोग से भारत का प्रधानमंत्री पद केवल डेढ़ वर्ष ही संभालने का उन्हें अवसर मिला। लेकिन इतने अल्पकाल मे ही उन्होंने बता दिया कि वे समय आने पर, कुशलता से और दृढ़ता से लड़ भी सकते हैं और भारत की शक्ति का परिचय भी दे सकते हैं।

भारत-पाकिस्तान युद्ध में उन्होंने यह सिद्ध कर दिखाया । वास्तव में उनमें चाणक्य जैसी पैनी सूझ-बूझ, सरदार पटेल जैसी दृढता और बापू जैसा गाम्भीर्य तथा शांतिप्रियता विद्यमान थी। इसीलिए वे वैषम्य परिस्थितियों में भी कभी विचलित नहीं हुए। भारत-पाक युद्ध के समय 3 सितंबर 1965 को उन्होंने राष्ट्र के नाम संदेश प्रसारित करते हुए कहा था I

लाल बहादुर शास्त्री – Lal Bahadur Shastri

“साथियो! मैं आज आपको पाकिस्तान के हमले और उससे जो हालात पैदा हो गए हैं, उसके संबंध में बताना चाहता हूं, और इस नाजुक घड़ी मे हमारे ऊपर जो जिम्मेदारियां और चिताएं आ पडी हैं, उनमें आपके साथ हिस्सा बंटाना चाहता हूं। पहली सितंबर को पाकिस्तान ने जम्मू के छंब-क्षेत्र में एक ब्रिगेड फौज लेकर हमारे ऊपर भारी हमला किया है। हमारे बहादुर जवान इस हमले का बड़ी बहादुरी से मुकाबला कर रहे है। मैं उन्हें दिल से बधाई देता हूं। सारे मुल्क को उन पर फक्र है और यकीन है कि वे मुल्क की हिफाजत अच्छी तरह करेंगे। इस नाजुक घड़ी मे हर आदमी को अपना फर्ज पूरी तरह दिल से अदा करना चाहिए । राष्ट्र को, कौम को हसते-हंसते कष्ट और मुसीबतें उठाने और कुर्बानी ने के लिए तैयार होना होगा। आजादी की रक्षा के लिए, उसकी हिफाजत के लिए यह कीमत हम सबको देनी ही होगी। आज सारे राष्ट्र के लिए, सारी कौम के लिए यह पुकार है कि वह इस चुनौती का डटकर सामना करने के लिए तैयार हो जाए।”

श्री शास्त्री जी के इस ‘शखनाद’ ने देश के जन-जन मे आजादी की रक्षा के लिए तड़फ पैदा कर दी। देखते-देखते करोड़ो की सपत्ति राष्ट्रीय रक्षा कोष में पहुंचने लगी। पूरा देश सैनिक वातावरण से गूंज उठा। अंततः विजय भारत की हुई। पुनः बाद में तुरंत अंतर्राष्ट्रीय परिस्थिति के अनुसार भारत की प्रतिष्ठा को तनिक भी धक्का पहुंचाए बिना, संधि भी कर दी।

इस प्रकार इस पुण्यभूमि को भारतीय संस्कृति का यह समन्वयवादी वामनमूर्ति नेता विश्व के सबसे बड़े दो राष्ट्रों के राजनीतिक नेताओं का एक-सा आदर प्राप्त कर सका। यह लालबहादुर शास्त्री की राजनैतिक सिद्धि भारत के लिए गौरवास्पद है। श्री लालबहादुर शास्त्री का प्रधानमंत्री के रूप में अल्पकाल भुलाया जा सकेगा। वे सचमुच देश से जननायक थे। जनता के वे ‘हममे से एक थे।

लाल बहादुर शास्त्री – Lal Bahadur Shastri

कृषको को तो शास्त्री जी अपना भाई कहा करते थे। ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा देकर उन्होंने राष्ट्र मे नई प्राण-शक्ति फूकी। ‘कम खाओ’ और ‘अधिक उपजाओं’ की उनकी भावना को आगे बढ़ाना होगा। उन्होंने दूसरो को सिखमात्र ही नही दी, स्वयं भी कम खाया और सादा जीवन व्यतीत कर अपने को देश का एक सच्चा नागरिक सिद्ध किया।

शांतिप्रिय शास्त्री जी ने यह स्वीकार किया कि वे ताशकंद जाकर रूसी प्रधानमंत्री कोसिगिन की मध्यस्थता में प्रेसीडेंट अय्यूब से समझौते के बारे में बात करेंगे। 3 जनवरी को प्रधानमंत्री ने ताशकंद वार्ता के लिए भारत से प्रस्थान किया। वहां बातचीत के बाद दोनों ने श्री कोसिगिन जी भूरि-भूरि प्रशसा करते हुए कहा कि शक्ति प्रयोग के त्याग के प्रश्न पर उत्पन्न हुए गतिरोध को भंग करने में उन्होंने असाधारण सूझ-बूझ तथा राजनीतिक कुशलता का परिचय दिया।

10 जनवरी, 1966 को दोनो ने ताशकंद घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए। उसी रात को उनकी तबियत खराब हुई और उनका असामयिक निधन हो गया। संपूर्ण राष्ट्र अपने प्रिय नेता के स्वागत की तैयारियां कर रहा था कि सहसा यह समाचार मिला कि हृदय की गति रुक जाने से लालबहादुर शास्त्री का देहावसान हो गया। यह समाचार भारत के लिए ही नहीं, संपूर्ण विश्व के लिए वज्राघात के समान प्रतीत हुआ। देश-विदेश से श्रद्धांजलिया अर्पित की गईं। श्री गुलजारीलाल नंदा ने कहा

लाल बहादुर शास्त्री – Lal Bahadur Shastri

“भारत के जनप्रिय नेता स्वर्गीय शास्त्री जी के विषय में जितना कहा जाए, कम होगा। अल्पकाल में ही उन्होंने भारत को समस्याओं को सुलझाने का जैसा सुंदर प्रयास किया, वह अब हमारे इतिहास का सुनहरा पृष्ठ है। हमारे बीच से एक ज्योति-पुंज उठ गया। मुझे पूरा विश्वास है कि उनके आदर्श और उनका जीवन हमेशा इस देश को रोशनी दिखाता रहेगा। हम भारतवासी उनके स्वप्न को साकार बनाने का प्रयत्न करें, यही दिवंगत नेता के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।”

राष्ट्रपति राधाकृष्णन ने उन्हें मरणोपरात ‘भारतरत्न’ के सर्वोच्च अलंकरण से विभूषित किया। वस्तुत: अल्प समय में ही अपने कार्यों से लालबहादुर शास्त्री ने सिद्ध कर दिया था कि वे प्रथम श्रेणी के सितारे बन चुके थे। उनका व्यक्तित्व महान था। उनके लिए राष्ट्र हो सर्वोपरि था। वे अपने हृदय से देश और देश वासियो को प्रेम करते थे।

Shetkaryancha Asud

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