बैजू बावरा – Baiju Bawra

बैजू-बावराबैजू बावरा

जन्म – 16 वीं शताब्दी के महान गायक संगीतज्ञ तानसेन के गुरुभाई पंडित बैजनाथ का में सन् 1542 में शरद पूर्णिमा की रात एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। पंडित बैजनाथ की बाल्यकाल से ही गायन एवं संगीत में काफ़ी रुचि थी। उनके गले की मधुरता और गायन की चतुराई प्रभावशाली थी। पंडित बैजनाथ को बचपन में लोग प्यार से ‘बैजू’ कहकर पुकारते थे। 

बैजू बावरा – Baiju Bawra

संगीत हमारी आत्मा की आवाज है। दिल खोलकर भजन कीजिए तो यह आपको आराध्य देव तक पहुँचा सकता है। ईश्वर के साथ तादात्म्य स्थापित करने का यह सर्वश्रेष्ठ साधन है। इसलिए किसी कवि ने ठीक ही लिखा है – “संगीत, साहित्य और कला विहीन व्यक्ति बिना पूँछ और सींग के पशु के समान है।” इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध कवि विलियम शेक्सपीयर ने लिखा है कि संगीत हमें सच्चा आनन्द प्रदान करने के साथ-साथ मानसिक और शारीरिक थकावट भी दूर करता है। अतः संगीत का साधक सदा प्रसन्नचित्त हो विचरण करता है।

भारत में संगीत का आचार्य देवाधिदेव महादेव को माना जाता है। देवी सरस्वती और देवर्षि नारद वीणा के माध्यम से संगीत का प्रचार करते रहे हैं, यह भी बहुतों की मान्यता है। भगवान श्रीकृष्ण की अद्भुत मुरली की तान सुनकर सारा चराचर मुग्ध हो जाया करता था तात्पर्य यह है कि हमारे यहाँ संगीत एवं नाट्य कला की परम्परा अत्यंत प्राचीन काल से ही है।

मुगलकालीन शासन में संगीत, कला और साहित्य का विकास उच्चतम शिखर पर था। मुगलकालीन प्रसिद्ध गायकों में स्वामी हरिदास, बैज़ू बावरा, गोपाललाल, तानसेन आदि के नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित हैं। भारत का बच्चा-बच्चा बैजू बावरा के नाम से परिचित है। कुछ लोगों की मान्यता कि बैजू बावरा की भिड़ंत तानसेन से हुई थी जिसमें बैजू बावरा को ही विजयश्री प्राप्त हुई थी। तानसेन अकबर के नौ रत्नों में से एक थे।

बैजू बावरा – Baiju Bawra

कुछ लोगों का मत है कि बैजू का आविर्भाव तानसेन के पहले हुआ था। पर अधिकांश विद्वानों का यही मत है कि बैजू, तानसेन, गोपाल लाल और अकबर के समकालीन थे। बैजू बावरा ध्रुपद के प्रसिद्ध गायक माने जाते हैं। उनके गाने में गोपाल लाल का नाम आया है। यथा–“कहत बैजू बावरे सुनो हो गोपाल लाल.

बैजू बावरा के संबंध में कोई बहुत प्रामाणिक ग्रन्थ नहीं हैं। इनका जन्म कब और कहाँ हुआ, यह भी विवादास्पद है। लेकिन कुछ विद्वानों ने प्रयास करके उनके संबंध में जो सामग्री प्रदान की है उसके आधार पर कहा जा सकता है कि उनका जन्म भारत के गुजरात प्रांत में हुआ था। श्री लक्ष्मीनारायण गर्ग ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘हमारे संगीत रत्न’ में उल्लेखित किया है कि वे केवल संगीतज्ञ ही नहीं बल्कि उच्च कोटि के कृष्ण भक्त भी थे।

इस संबंध में श्री एस. बी. बन्चन द्वारा लिखित एक लेख में बैजू बावरा के संबंध में विशेष जानकारी दी गयी है। उन तथ्यों के अनुसार – श्री एस.बी. बब्बन के अनुसार, “बैजू बावरा का जन्म गुजरात के अंतर्गत चापानेर ग्राम के एक ब्राह्मण कुल में हुआ था। बैजू का असली नाम बैजनाथ मिश्र था। बाल्यकाल में ही इनके पिता का स्वर्गवास हो गया। बैजू की माँ धार्मिक मनोवृत्ति की तथा भगवान मुरली मनोहर की उपसिका थी।

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स्वामी विवेकानंद – Swami Vivekananda

उन्हीं के स्नेहांचल में बैजू बढ़ने लगे। बालक बेजू के मनोरंजनार्थ उनकी माँ बहुधा उन्हें भगवान बालकृष्ण का पवित्र चरित्र सुनाया करती थीं, अस्तु बाल्यकाल से ही बैजू भगवान कृष्ण की ओर आकृष्ट होने में कुछ दिवसोपरात पारिवारिक असुविधाओं के कारण बैजू की माँ सब कुछ परित्याग कर अपनी आयु की शेष अवधि भगवान बांके बिहारी की शरण में बिताने का निश्चय कर वृन्दावन की ओर चल पड़ी। बैजू भी उनके साथ चले।

जमुना के सुरम्य तट पर वृन्दावन के निकटवर्ती वन में संगीताचार्य रसिक शिरोमणि स्वामी हरिदास जी का आश्रम था। लम्बी यात्रा करने के कारण बैजू की माँ बहुत थक गई थी। अतः विश्राम के लिए उसी वन में ठहर गई। उसी समय जमुना स्नान कर स्वामी हरिदास जी अपने आश्रम की ओर लौट रहे थे। स्वामीजी की दिव्य दृष्टि ने बैजू की आंतरिक प्रतिभा को देख लिया और उस विलक्षण बालक को अपनी शरण में आश्रय दिया।”

इधर बैजू की माँ भगवान कृष्ण की उपासना करने लगीं, उधर बैजू स्वामी हरिदास के सान्निध्य में रहकर उनके निर्देशन में संगीत साधना करने लगे। उर्वर भूमि में समुचित मात्रा में बीज दिया जाये तो उत्पादन अवश्य ही अधिक होता है। शिष्य की सुरीली आवाज और तन्मयता से गुरु हरिदास बहुत ही प्रसन्न थे। बैजू उनके निर्देशन में संगीत की लहरी में डूबने-उतराने लगे।

बैजू बावरा – Baiju Bawra

गुरु के आशीर्वाद से वे शीघ्र ही प्रख्यात गायक बन गये। स्वामीजी के दिव्य संगीत, आश्रम के पवित्र जीवन और भगवान कृष्ण की अविरल भक्ति के संयुक्त प्रभाव के कारण बैजू का मन संसार से विरक्त होने लगा और वे भक्ति योग की ओर आकृष्ट होने लगे। बैजू एक दिन जमुना के तट पर केदारा रागिनी साध रहे थे। तभी एक छोटे बालक का रुदन सुनाई पड़ा।

बालक बहुत ही सुन्दर और तेजस्वी था। उसे वे अपने गुरु आश्रम में लाये। गुरु ने बालक का नाम गोपाल रखा। गोपाल को बैजू बहुत प्यार करते थे। गोपाल भी बैजू के साथ संगीत साधना करने लगा। बैजू बावरा ने गुरु के आशीर्वाद से अनेक राग-रागिनियों दक्षता प्राप्त कर ली। उनके गीत सुनकर जानवर भी मंत्रमुग्ध हो जाते अद्भुत थी उनकी संगीत कला संयोगवश उनकी मुलाकात कछवाह वंशज जमींदार राजसिंह से हुई जो उन्हें चंदेरी ले गये।

वहाँ कला और प्रभा नामक दो सुन्दरियाँ बैजू से संगीत सीखने लगी। बैजू के साथ गोपाल भी चंदेरी में रहने लगे। गोपाल की कला से मुग्ध होकर प्रभा ने उनसे विवाह कर लिया जिससे एक कन्या उत्पन्न हुई। बैजू ने उस कन्या का नाम मीरा रखा। मीरा तेजी से बढ़ने लगी और बैजू उसे अपना अपार स्नेह देने लगे। ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर की रानी मृगनयनी ने बैजू के निर्देशन में संगीत शिक्षा प्रारंभ की I महाराज मानसिंह स्वयं बैजू का सम्मान करते थे। बैजू के संगीत से ये काफी प्रभावित थे।

बैजू बावरा – Baiju Bawra

बैजू ने स्वयं कई रागों की रचना की। इनमें गुजरी टोड़ी, मृगरजनी, मंगल गूजरी इत्यादि प्रमुख है। बैजू के आगे खालियर के प्रसिद्ध गायक विजय जंगम टिक न पाये। बैजू के समकालीन सभी गायक मुक्त कण्ठ से उनकी प्रशंसा करते थे। बैजू गोपाल को बड़ा स्नेह करते थे। उसके ही चलते उसका संपर्क हरिदास जी से हुआ I गोपाल ने अपना घर बसाया।

एक दिन गोपाल जब चन्देरी के निकटवर्ती वन में ‘कल्याण’ राग का आलाप कर रहा था, तो उसकी भेंट कुछ कश्मीरी व्यापारियों से हुई। वे व्यापारी इसकी कला से काफी प्रभावित थे। वे गोपाल को वैभव का लालच देकर कश्मीर ले जाना चाहते थे। अपनी पत्नी व पुत्री के विरोध के बावजूद बिना बैजू से पूछे वह कश्मीर चला गया। सामान्य लोग जिस व्यक्ति से लाभ पाते हैं, समय आने पर उसकी उपेक्षा करते देखे जाते हैं।

बैजू की प्रतिभा को चिरस्थाई रखने के लिए महारानी मृगनयनी और मानसिंह ने एक संगीत विद्यापीठ की स्थापना की जिसके पाठ्यक्रम में ‘होरी गायकी’ और ‘धम्मार’ ताल को सम्मिलित किया गया। बैजू कला की उच्चतम शिखर पर पहुँच चुके थे। जब व्यक्ति अपने ही लोगों द्वारा ठगा जाता है तब उसके हृदय में असह्य पीड़ा उत्पन्न होती है।

बैजू बावरा – Baiju Bawra

बैजू को ऐसा ही आघात सहना पड़ा। गोपाल के विश्वासघात और कृतघ्नता का समाचार सुनकर वह व्यथित हुआ। वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठा। महारानी मृगनयनी ने उसके उपचार में कोई बात न उठा रखी लेकिन बैजू अपनी स्नेहमयी मीरा को भूल न सका। पागल हो इधर-उधर भटकने लगा। तभी से लोग उसे बैजू बावरा कहने लगे ।

बैजू की विक्षिप्तावस्था की खबर पर स्वामी हरिदास काफी दुःखी हुए। उनकी छत्रछाया में तन्ना मिश्र नामक युवक साधना कर रहा था जो बाद में मुसलमान हो गया तथा इतिहास में ‘तानसेन’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया। बैजू की महानता से तानसेन काफी प्रभावित हुआ और उसने बैजू के अनुसंधान का प्रयत्न करना शुरू कर दिया।

इघर बैजू पागल हो सड़क की खाक छान रहे थे, उधर कृतघ्न गोपाल कश्मीर में राजा का दरबारी गायक होकर मौज उड़ा रहा था। राजा ने जब गोपाल से गुरु का नाम पूछा तो उसने कहा कि उसका कोई गुरु नहीं है। उसने स्वयं संगीत का अभ्यास किया है। आदमी स्वार्थपरता में कितना नीच हो जाता है, कोई गोपाल से सीखे।

बैजू बावरा – Baiju Bawra

इधर तानसेन अपने गुरुभाई की खोज में ग्वालियर आया जहाँ बैजू द्वारा स्थापित संगीत विद्यापीठ में होरी गायकी और धमार ताल का अभ्यास किया। रीवां में पहुँचने पर वहाँ के राजा ने तानसेन को अपना दरबारी गायक बनाकर सम्मान किया लेकिन उसे तो बैजू को ढूँढ़ निकालने का भूत सवार था। कुछ दिनों बाद घूमते-घूमते बैजू पुनः वृन्दावन पहुँचे। वहाँ देवतुल्य गुरु हरिदास एवं अपनी वृद्धा माँ के आशीर्वाद से उन्हें कुछ लाभ पहुँचा पर मीरा का स्नेह उन्हें अभी भी जब-तब विह्वल कर देता था।

अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए दिल्ली दरबार के गायकों को प्रतियोगिता के लिए बुलाया पर मन ही मन सभी तानसेन की महत्ता स्वीकार कर चुके थे। सम्राट् अकबर ने भी तब तानसेन की श्रेष्ठता स्वीकार कर ली। बैजू तानसेन की श्रेष्ठता की खबर पाकर आश्चर्यचकित हुआ। उसकी कलात्मकता, उसकी श्रेष्ठता स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी।

आगरा के निकट वन में संगीत प्रतियोगिता का आयोजन हुआ जहाँ बैजू पहुँचे। प्रतियोगिता सम्राट् अकबर के आदेश से आरंभ हुई। तानसेन और बैजू दोनों एक-दूसरे को पहले पहचान न सके। तानसेन ने ‘टोड़ी’ राग सुनाया। सारे लोग आनन्दविभोर हो गये। साथ ही साथ मृगाओं का एक झुण्ड संगीत के प्रभाव से वहाँ जुट गया। तानसेन ने एक हार लेकर एक संगीतमुग्ध हिरण के गले में पहना दिया। संगीत समाप्त होने पर हिरण जनसमूह देखकर पुनः वन में भाग गये।

बैजू बावरा – Baiju Bawra

इसके बाद बैजू बावरा ने ‘मृगरजनी’ राग गाकर उस मृग को अपने पास बुला लिया जिसके गले में हार पड़ा था। उसके गले का हार उतारकर बैजू ने सम्राद् अकबर को दे दिया। इस अद्भुत चमत्कार को देखकर अकबर, तानसेन के साथ-साथ सभी उपस्थित जन-समूह आश्चर्यचकित रह गया। तदुपरान्त आश्चर्यचकित अकबर ने बैजू को गाने के लिए आदेश दिया तथा उसका उत्तर देने के लिए तानसेन को कहा।

बैजू ने मालकोश राग अलापना शुरू किया जिसके प्रभाव के चलते सामने पड़ा हुआ पत्थर मोम के समान पिघलने लगा। तानसेन ने कोई गाना नहीं गाया बल्कि आश्चर्यचकित होकर बैजू के चरणों में गिर पड़े और बोले कि ऐसा सुन्दर गाना मेरे बड़े गुरुभाई के अलावा कोई गा ही नहीं सकता है। दोनों का परिचय होने पर आनन्द का ठिकाना न रहा और दोनों गुरुभाई की आँखों से आनन्दाश्रु की धारा बह निकली।

तानसेन के दिग्विजय का मोह भंग कर बैजू कश्मीर की ओर चल पड़े जहाँ गोपाल अपने परिवार के साथ रह रहा था। बैजू राजदरबार में पहुँचे तो गोपाल लज्जित हुआ। जब बैजू ने यहाँ प्रभावशाली ध्रुपद सुनाया तब सभी आश्चर्यचकित हो उनकी ओर देखने लगे। राजा को यह कहना पड़ा कि ऐसा ध्रुपद उसने कभी भी नहीं सुना है। गोपाल लाल की पोल खुल गयी जिसने दरबार में कहा था कि मेरा कोई गुरु नहीं है। अब सब लोग यह जान गये कि गोपाल के गुरु यही बैजू हैं।

बैजू बावरा – Baiju Bawra

कुछ दिनों बाद गोपाल की मृत्यु हो गयी। बैजू बावरा ने गोपाल की मृत्यु से दुःखी होकर संन्यास ग्रहण कर लिया और कश्मीर की घाटियों में घूम-घूमकर अपना समय बिताने लगे और वहीं उनके प्राण पखेरू उड़ गये।

मृत्यु – बैजू संगीत के क्षेत्र में अमर हैं। उन्होंने हजारों संगीतज्ञों को प्रेरित किया है। आवश्यकता है उनके संबंध में और अधिक अनुसंधान करने की। उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि उनकी स्मृति में संगीत महाविद्यालय खोला जाये और संगीत का आम जनता तक प्रचार किया जाये।

Shetkaryancha Asud

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