डॉ राजेंद्र प्रसाद – Dr Rajendra Prasad

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महात्मा गांधी के विराट व्यक्तित्व से प्रभावित होकर जो नेता स्वतंत्रता आदोलन में कूद पड़े उनमे डॉ.राजेन्द्र प्रसाद का नाम विशेष उल्लेखनीय है । भारत को स्वतंत्रता दिलाने में उन्होंने गांधी जी की छत्रच्छाया मे एक महान सेनानी के रूप मे कार्य किया। स्वतंत्रता प्राप्ति पर वे देश के प्रथम राष्ट्रपति बने । वे लगभग अर्धशताब्दी तक देश के नवजागरण और नव निर्माण में संलग्न रहे।

डॉ राजेंद्र प्रसाद – Dr Rajendra Prasad

वे सदा प्रकाशमान और सफल पथप्रदर्शक रहे। उनका ओजस्वी जीवन हमारे देश के इतिहास, विशेषतः राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास, के पृष्ठो को सदा ज्योतित करता रहेगा। देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद ऐसे विभूत हो गये हैं जिनसे लोग युग-युग तक प्रेरणा ग्रहण करते रहेंगे। वे हमारे युग के महानतम व्यक्तियों में से एक थे। वे प्रकाण्ड विद्वान, यशस्वी लेखक और उच्च कोटि के देशभक्त थे।

भारत माँ को पराधीनता की बेड़ियों से मुक्त करने के लिए उन्होंने कई बार जेल यात्रायें की और यातनायें सही। डॉ. राजेन्द्रप्रसाद का जन्म 3 दिसम्बर 1884 ई. में तत्कालीन सारण जिले के जीरादेई गाँव में एक सम्पन्न कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके पूर्वज उत्तर प्रदेश के अमोठा नामक गाँव से पहले बलिया में रहे और बाद में जीरादेई में आ बसे थे। उनके पूर्वजों की एक शाखा गया में जाकर निवास करने लगी।

डॉ. राजेन्द्रप्रसाद के पितामह श्री मिश्रीलाल युवावस्था में ही स्वर्ग सिधारे। अतः राजेन्द्र बाबू के पिता श्री महादेव सहाय का लालन-पालन उनके भाई चौधूरलाल ने ही अपने पुत्र जयदेव सहाय के समान किया। महादेव सहाय उर्दू और फारसी के ज्ञाता थे, घुड़सवारी का शौक रखते थे। राजेन्द्र बाबू के पूर्वज हथुआ राज्य के दीवान थे चोयूरलाल ने बड़ी ईमानदारी और निष्ठा से राजपरिवार की सेवा की राजेन्द्र बाबू के बड़े भाई का नाम श्री महेन्द्रप्रसाद और बड़ी बहन का नाम भगवतीदेवी था।

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डॉ. राजेन्द्रप्रसाद का बचपन बहुत सुखमय था गांव के बच्चों के साथ कबड्डी और चौका जमकर खेलते। उन्होंने अपने पिता से घुड़सवारी सीखी। घर में ही उनकी प्रारम्भिक शिक्षा की व्यवस्था उनके अन्य भाइयों के साथ ही एक मौलवी साहब की देखरेख में की गई। राजेन्द्र बाबू रोज सवेरे जगते और रात होते ही सो जाते। उनकी यह आदत जीवनपर्यन्त बनी रही। उनकी माता बहुत पढ़ी-लिखी नहीं थी, परन्तु धार्मिक थीं।

घर में उर्दू, फारसी का चलन तो था ही। लेकिन इसके बावजूद हिन्दू देवी-देवताओं की भक्तिपूर्वक आराधना की जाती। उनकी माता प्रतिदिन सवेरे राजेन्द्र बाबू को प्रभाती और रामायण की कहानियाँ सुनाया करती थी। राजेन्द्र बाबू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि माँ का प्रभाव उनके जीवन पर काफी पड़ा था। राजेन्द्र बाबू का नामांकन पहले छपरा जिला स्कूल में कराया गया।

यहाँ उन्हें कुशाग्र बुद्धि होने के कारण प्रधानाध्यापक ने डबल प्रोमोशन दिया। वैसे तो सभी शिक्षक राजेन्द्र बाबू को प्यार करते और ये भी उनका समुचित सम्मान करते, पर रसिकलाल राय नामक शिक्षक का वे सबसे अधिक आदर करते थे। जिला स्कूल के बाद पटना के टी. के. घोष एकेडमी (T.K. Ghosh Academy) में वे पढ़ते चले आये। इन्ट्रेन्स की परीक्षा में उन्होंने सर्वप्रथम स्थान प्राप्त किया था। उनकी उत्तरपुस्तिका में पद अंकित था- “Examinee is better than examiner. अर्थात् परीक्षार्थी परीक्षक से बेहतर है।

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रसिकलाल ने कलकत्ता जाने से पहले राजेन्द्र बाबू को कई मूल्यवान राय दी थी। उन्होंने समझाया था कि कलकत्ता बहुत बड़ी नगरी है। बंगाली लड़के सम्भव है कि उनकी योग्यता के चलते उनसे ईर्ष्या रखें। बहुत बुद्धिमानीपूर्वक कलकत्ता में रहकर विद्याध्ययन करने की राय मास्टरजी ने दी। राजेन्द्र बाबू ने उनकी सलाह का अक्षरशः पालन किया।

उनकी इच्छा थी कि वे कलकत्ता के प्रेसीडेन्सी कॉलेज में ही पढ़ें। उनकी इच्छा पूरी है। वहीं से 1904 ई. में एफ.ए. (E.A.) की परीक्षा में उन्होंने प्रथम स्थान प्राप्त किया। उन्हें छात्रवृत्ति मिल गई। कलकत्ता से ही उन्होंने बी.ए. से लेकर एल.एल.एम. तक की परीक्षाएँ पास की। प्रायः सभी परीक्षाओं में उन्होंने सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया और छात्रवृत्ति पाते रहे।

उनके प्रमुख शिक्षकों में डॉ. पी. सी. राय और सर जगदीशचन्द्र बोस जैसे अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान थे। उनके प्रमुख साथियों में जे. एम. मजुमदार तथा जे. एन. सेनगुप्त थे जो बाद में कांग्रेस के महत्त्वपूर्ण नेता हुए। दिसंबर सन् 1906 मे काग्रेस का वार्षिक अधिवेशन कलकत्ता में हुआ। इसमे सर्वप्रथम एक स्वयंसेवक के रूप में राजेन्द्र बाबू ने भाग लिया। यहां उन्हें विषय-निर्धारिणी समिति की बहसें सुनने का मौका मिला।

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यही पर उन्हें सरोजनी नायडू, मदन मोहन मालवीय, जिन्ना आदि के भाषण सुनने को मिले। इस अधिवेशन की कार्यवाही और विचारों से राजेन्द्र बाबू के मन में कांग्रेस के प्रति श्रद्धा बढ गई। इस सामाजिक एवं राजनीतिक रुचि ने इतना बल पकड़ा कि पढ़ाई में विघ्न पड़ने लगा। परिणामतः वह एम० ए० कक्षा में पहले की तरह सफलता प्राप्त न कर सके। तत्पश्चात् उन्होंने कानून को परीक्षा पास की।

एक बार उनके कानून के किसी प्रश्नपत्र को देखकर एक अंग्रेज परीक्षक ने प्रायः पूरे के पूरे अंक दे दिये थे और जब विश्वविद्यालय की ओर से इसके बारे में पूछा गया तो परीक्षक ने लिखा कि ऐसे उत्तर में स्वयं भी नहीं दे सकता था। दो वर्ष तक इन्होंने वकालत का काम भी किया। इनकी वकालत में भी नैतिकता को देखकर कई वकील इनके प्रशंसक बन गये।

हाईकोर्ट के जज श्री आशुतोष मुकर्जी ने इन्हें ला कालेज में प्राध्यापक नियुक्त किया। कलकत्ता मे जब राजेन्द्र बाबू वकालत पढ़ रहे थे तब वहां सबसे पहले उनकी गोखले जी से मुलाकात हुई। गो जो ने कुछ समय पूर्व ही ‘सवॅट आफ इंडिया सोसाइटी’ की स्थापना की थी। उन्हें राजेन्द्र बाबू की प्रतिभा और बुद्धिमत्ता का परिचय मिल चुका था।

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उन्होंने राजेन्द्र बाबू से देश सेवा के लिए इस समिति में सम्मिलित होने का आग्रह किया। उन्होने इस समय राजेन्द्र बाबू से कहा- “हो सकता है तुम्हारी वकालत खूब चले, बहुत रुपये तुम पैदा कर सको, बहुत आराम और ऐश-इशरत में दिन बिताओ। बड़ी कोठी, घोडागाड़ी, नौकर इत्यादि दिखावट के के हुआ करते है, तुमको सब उपलब्ध हो। पर देश का भी दावा कुछ लड़को पर होता है, और चूंकि तुम पढ़ने में अच्छे हो इसलिए तुम पर यह दावा और भी अधिक है।”

गोखले जी के उपर्युक्त कथन का राजेन्द्र बाबू के मन पर गहन प्रभाव पड़ा। उनका हृदय-मंथन शुरू हुआ। एक ओर पारिवारिक दायित्व, धन-वैभव का आकर्षण और दूसरी ओर देश सेवा का कठोर व्रत । अंततः गोखले की बात मान कर वे उनको समिति के सदस्य बन गये। इन्ही दिनों राजेन्द्र बाबू का हिंदी के प्रति प्रेम जाग्रत हुआ। कलकत्ता की हिंदी साहित्य परिषद् से राजेन्द्र बाबू का निकट का संबंध रहा।

उन्होंने कुछ लेख लिखे जिसमें अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन की आवश्यकता पर बल दिया। आपको सन् 1912 के दिसबर में सम्मेलन के तृतीय अधिवेशन को स्वागत समिति का प्रधान बनाया गया। डॉ. राजेन्द्रप्रसाद छात्र जीवन से ही भारतीय राजनीति में काफी अभिरुचि लेने लगे थे। वे राष्ट्रीय आन्दोलन से भी धीरे-धीरे परिचय प्राप्त कर रहे थे। कलकत्ता में बिहारी छात्रों का उन्होंने एक संगठन बनाया था।

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बाद में मुंगेर में हुए छात्र-सम्मेलन की अध्यक्षता भी की। में राजेन्द्र बाबू ने 1911 ई. में कलकत्ता उच्च न्यायालय में वकालत प्रारम्भ को वे इस क्रम में वहाँ के सुप्रसिद्ध वकील समशूल हूदा के सम्पर्क में आये। हूदा साहब ने उनकी योग्यता का बड़ा आदर किया। प्रथम दिन में उन्हें एक मुकदमा पैरवी करने के लिए दे दिया। थोड़े ही दिनों में उनकी वकालत चमक गई। 1916 ई. में जब पटना में हाईकोर्ट की स्थापना हुई तब वे वहीं चले आये।

डॉ. राजेन्द्रप्रसाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से काफी प्रभावित थे। 1911 ई. में ही उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता स्वीकार कर ली। चम्पारण आन्दोलन के क्रम में उनका सम्पर्क महात्मा गांधी से हुआ। वैसे लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में वे दोनों अगल-बगल बैठे थे और संकोचशील होने के कारण राजेन्द्र बाबू महात्मा गाँधी से कुछ बातें नहीं कर सके। पंडित राजकुमार शुक्ल और श्री ब्रजकिशोर प्रसाद ने गाँधीजी से भेंट कर बिहार में आने का निमंत्रण दिया।

चम्पारण के किसानों की बुरी स्थिति से श्री शुक्ल ने महात्माजी को परिचित कराया। महात्मा गाँधी चम्पारण आते वक्त पटना में डॉ. राजेन्द्रप्रसाद के घर पर ठहरे थे। उन्हें साधारण मुवक्किल समझकर राजेन्द्र बाबू के मुंशी ने बरामदे में ही ठहरा दिया था। मजहरूल हक ने उनसे मुलाकात की और अपने यहाँ गाँधीजी को ठहरने का आग्रह किया। राजेन्द्र बाबू जब बाहर से लौटे तो यह बात सुन बहुत दुखी हुए।

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आचार्य जे.बी. कृपलानी, राजेन्द्रप्रसाद, श्री राजकुमार शक्ल आदि ने चम्पारण आन्दोलन में खुलकर साथ दिया। राजेन्द्र बाबू उसी समय से गाँधीजी के कट्टर अनुयायी बन गये। असहयोग आन्दोलन उसका सदस्य में डॉ. राजेन्द्रप्रसाद ने खुलकर महात्माजी का साथ दिया। 1922 ई. में गया कांग्रेस अधिवेशन की स्वागत समिति का सचिव उन्हें चुना गया।

डॉ. अनुग्रह नारायण सिंह बनाया गया था। गया कांग्रेस अधिवेशन में देशबन्धु चितरंजन दास और मोतीलाल नेहरू के नेतृत्व में स्वराज दल के गठन के निर्णय लेने पर भी राजेन्द्र बाबू ने गाँधीजी का ही साथ दिया था। साइमन आयोग के बिहार में बहिष्कार करने का नेतृत्व डॉ. राजेन्द्रप्रसाद ने ही किया। नमक कानून तोड़ो आन्दोलन, सविनय अवज्ञा आन्दोलन और भारत छोड़ो आन्दोलन में उन्होंने डटकर भाग लिया।

सन् 1930 के नमक सत्याग्रह मे राजेन्द्र बाबू ने बिहार में पं० जवाहरलाल नेहरू जी का एक व्यापक दौरा करवाया। इसके अनंतर स्वयं भी नमक सत्याग्रह के लिए सारे बिहार में अनेक प्रयत्न कर आदोलन को सफल बनाया। मद्य निषेध और विदेशी वस्त्र बहिष्कार के कार्यक्रम भी इस सत्याग्रह के अंग थे। इनके क्रियान्वयन में राजेन्द्र बाबू ने देश के अन्य भागो की भांति अपने प्रदेश में भी अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की।

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इस सत्याग्रह मे राजेन्द्र बाबू सर्वप्रथम गिरफ्तार किए गए। बीहरपुर के सत्याग्रह में तो राजेन्द्र बाबू बुरी तरह पीटे गए जिससे वे घायल भी हो गए। राष्ट्रीय आन्दोलनों में भाग लेने के अलावा वे बहुत से सामाजिक संगठनों से भी जुड़े हुए थे। श्री गोपालकृष्ण गोखले द्वारा स्थापित ‘सर्वेन्ट्स ऑफ इण्डिया सोसायटी के वे सदस्य थे।

1934 ई. में बिहार में बड़ा भूकम्प आया था जिसमें काफी जान-माल को क्षति हुई थी। उन्होंने भूकम्प पीड़ितों को हर संभव सहायता दी और पटना में बिहार केन्द्रीय सहायता समिति की स्थापना की। उनके अनुरोध पर काफी लोगों ने आर्थिक सहायता प्रदान की। महात्मा गाँधी ने भी भूकम्प पीड़ितों की अवस्था स्वयं आकर देखी। राजेन्द्र बाबू की सेवाओं से प्रभावित होकर उन्हें उसी वर्ष भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया।

उन्होंने तीन बार अध्यक्षता की। कांग्रेस खेमे में उन्हें अजातशत्रु माना जाता था। सभी उनकी विद्वत्ता और विनम्रता के कायल थे। अध्यक्ष के रूप में उन्होंने दल की गरिमा में चार चाँद लगा दिये। 9 दिसम्बर, 1946 को संविधान सभा के अस्थायी अध्यक्ष वयोवृद्ध बिहारी नेता सच्चिदानन्द सिन्हा चुने गये 11 दिसम्बर, 1946 को संविधान सभा ने स्थायी रूप से डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जी को ही अध्यक्ष चुना।

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उन्होंने बड़ी योग्यता और ईमानदारी के साथ इस पद का निर्वाह किया। भारत के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में 26 जनवरी, 1950 को उन्हें शपथ दिलाई गई। उन्हें 1952 में और फिर 1957 में राष्ट्रपति निर्वाचित किया गया। 10 मई, 1962 को दिल्ली के रामलीला मैदान में उनके विदाई समारोह में लोग उमड़ पड़े थे। सभी ने मुक्त कण्ठ से उनकी सेवा और त्याग की प्रशंसा की।

डॉ. राजेन्द्रप्रसाद ने जनसमूह के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए कहा कि आज वे अधिक स्वतंत्र महसूस कर रहे हैं। 12 मई को उन्होंने राष्ट्रपति पद से अवकाश ग्रहण किया और 14 मई से अपने पुराने निवास स्थान सदाकत आश्रम में आकर रहने लगे। सदाकत श्रम में रहते हुए भी उन्होंने सदा साहित्य और समाज की सेवा की। उनका कहना था कि लेखक समाज के स्रष्टा और द्रष्टा दोनों होते हैं। उनका यह कर्तव्य है कि ये स्वार्थ से उठकर निष्पक्ष भाव से जनसमूह की सेवा करें।

डॉ. राजेन्द्रप्रसाद का निधन 28 फरवरी, 1963 ई. को राम-नाम करते-करते हो गया। सारा राष्ट्र शोकाकुल हो उठा। पं. जवाहरलाल नेहरू के साथ-साथ अनेक राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय नेताओं, विद्वानों, समाजसेवियों एवं विद्वज्जनों ने अपनी हार्दिक संवेदना प्रकट कि। राजेन्द्र बाबू के जीवन से हमें त्याग और तपस्या की शिक्षा मिलती है। ये साम्प्रदायिक सद्भावना के प्रतीक थे।

डॉ राजेंद्र प्रसाद – Dr Rajendra Prasad

जीवनपर्यन्त उन्होंने राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के लिए कार्य किया वे सचमुच मानव रूप में एक ऋषि थे जिन्होंने अपने देशवासियों की हर संभव सेवा की। उन्हें जनसमूह ने देशरत्न की उपाधि दी। बड़ों का सम्मान करना और छोटों को समुचित स्नेह और प्यार देना राजेन्द्र बाबू भली भाँति जानते थे। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, पर उनके त्याग और कृतित्व से हम सदा आगे बढ़ने की प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं।

Shetkaryancha Asud

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