गौतम बुद्ध – Gautama Buddha

गौतम-बुद्धगौतम बुद्ध

गौतम बुद्ध भारत के सबसे बड़े लोकनायक थे। लोकनायक वही व्यक्ति हो सकता है जो आम जनता की भाषा में उनकी समस्याओं से उन्हें अवगत कराये। महात्मा बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद तत्कालीन लोक भाषा पाली द्वारा ही अपने अमृतमय उपदेशों से समस्त जनता में प्रकाश बिखेरा। इसलिए वे सबसे सफल लोकनायक सिद्ध हुए।

गौतम बुद्ध – Gautama Buddha

महात्मा बुद्ध का आविर्भाव उस समय हुआ जब वैदिक धर्म में आडम्बर का प्रवेश हो चुका था। समाज में बलि देने की प्रथा प्रचलित हो गयी थी। यज्ञों में निरीह पशु बलि वेदी पर चढ़ाये जा रहे थे लोग शाश्वत सत्य के लिए प्रयत्नशील नहीं थे, अपना अधिकांश समय वाद-विवाद में व्यतीत कर रहे थे। आवश्यकता थी एक ऐसे युगपुरुष की जो अवतरित हो मानव में करुणा, मैत्री, सत्य, अहिंसा और भाईचारे का संदेश फैला सके।

हमारे शास्त्रों में वर्णित है कि जब-जब पृथ्वी पर अत्याचार और अनाचार की वृद्धि होती है तब-तब दिव्य आत्माएं अवतार ग्रहण कर समाज में शान्ति और सुव्यवस्था कायम करती हैं। संस्कृत के एक प्रसिद्ध कवि जयदेव ने दशावतार का वर्णन करते हुए माना है। कि बुद्ध भगवान विष्णु के नवम् अवतार थे। अपनी पुस्तक ‘गीत गोविन्द’ में उन्होंने लिखा है :

“निंदसि यज्ञविधेरहम् श्रुति जातम्

सदय हृदय दर्शित पशु घातम्,

केशव घृत बुद्ध शरीर,

जय जगदीश हरे। “

तात्पर्य यह है कि गौतम बुद्ध भी भगवान के ही एक अवतार थे।

बुद्ध का जन्म ईसा से 583 वर्ष पहले नेपाल राज्य के कपिलवस्तु में शाक्यवंशी राजा शुद्धोदन के घर में हुआ था और देहावसान ईसा के 463 वर्ष पहले हुआ था। असल में बुद्ध का जन्म लुम्बिनी नामक स्थान में साल वृक्षों के कुंज में हुआ था। उनकी माता माया देवी अपने मायके जा रही थी। रास्ते में ही उन्होंने बुद्ध को जन्म दिया था। वे नवजात शिशु को लेकर राजमहल में लौटी।

गौतम बुद्ध – Gautama Buddha

बुद्ध का नाम बचपन में सिद्धार्थ था। उन्हें गौतम भी कहा जाता था, क्योंकि उनका गोत्र गौतम था। जन्म के सात दिनों के बाद ही सिद्धार्थ की माता मायादेवी का देहान्त हो गया। अतः उनका लालन-पालन माया की बहन प्रजापति गौतमी ने ही किया। बचपन से ही सिद्धार्थ में अनेक विशेषताएं मौजूद थी। एक दिन एक ज्योतिषी ने शिशु सिद्धार्थ को देखकर भविष्यवाणी की थी कि एक दिन यह बालक महान बनेगा।

वह फूट-फूट कर रोने लगा कि वह उनके अमृतमय उपदेशों को सुनने के लिए उस समय तक जिन्दा नहीं रहेगा। पिता शुद्धोदन ने बालक सिद्धार्थ के लिए समुचित शिक्षा की व्यवस्था की सामान्य शिक्षा के अलावा गीतम ने घुड़सवारी, तलवारबाजी, कुश्ती लड़ने आदि की कलाओं में भी शीघ्र दक्षता प्राप्त कर ली। इतना होने के बावजूद गौतम का मन राजकार्य में नहीं लगता था। वे संसार में रहते हुए भी सांसारिकता से बहुत ऊपर उठ चुके थे।

राजा ने उनके आराम के लिए सुन्दर भवन का निर्माण किया, जिससे उनका मन रम सके। उनका विवाह परम सुन्दरी यशोधरा के साथ हुआ जिससे उन्हें एक ‘राहुल’ नाम का पुत्र भी प्राप्त हुआ। राजा शुद्धोदन के आनन्द की सीमा न रही। उन्हें अब विश्वास हो गया कि गौतम राजकार्य संभाल लेगा पर होता वही है जो भगवान को मंजूर होता है। एक दिन गौतम राजमहल से बाहर घूमने निकले।

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रास्ते में उन्होंने एक वृद्ध, एक बीमार और एक मृत व्यक्ति को देखा पहले कभी भी उन्होंने ऐसा दृश्य नहीं देखा था। कारण, उन्हें राजमहल से बाहर नहीं निकलने दिया जाता था। उन्हें सारथी से पूछने पर पता चला कि वह व्यक्ति बूढ़ा है और एक दिन सभी बूढ़े होकर बीमार पड़ते और मर जाते हैं।

सिद्धार्थ जब राजमहल लौटे तो उस रात उन्हें नींद नहीं आयी। उन्होंने जगत् की निस्सारता का अनुमान कर लिया। उन्होंने सोचा कि सच्चा पुरुषार्थ इसी में है कि आवागमन के बंधन से मुक्त होने का उपाय सोचा जाये। सोती हुई यशोधरा और राहुल को छोड़ उन्होंने संन्यास व्रत लेने का निर्णय किया।

सत्य की खोज में गौतम निकल पड़े। संन्यासी देश में वे इधर-उधर घूमते रहे। उस समय उनकी अवस्था मात्र उन्तीस साल की थी। इसी क्रम में वे वैशाली पहुंचे, जहां उन्होंने भारतीय षड्दर्शन का अध्ययन किया, किन्तु उन्हें शान्ति न मिली ये राजगृह गए जहां उनकी प्रसिद्ध विद्वान् रुद्रक से भेंट हुई और उनके ज्ञान से प्रभावित हुए, परन्तु शान्ति वहां भी नहीं मिली। फिर उन्होंने तपस्या की, किन्तु उन्हें सच्चा ज्ञान नहीं मिल पाया। अंत में घूमते-घूमते वे गया के निकट पहुंचे जहां पीपल के पेड़ के नीचे ध्यान में मग्न हो गए।

गौतम बुद्ध – Gautama Buddha

वैशाखी पूर्णिमा के दिन सिद्धार्थ वटवृक्ष के नीचे ध्यानपूर्वक अपने ध्यान में बैठे थे. गाँव की एक महिला नाम सुजाता का एक पुत्र हुआ था, उस महिला ने अपने पुत्र के लिये उस वटवृक्ष से एक मन्नत मांगी थीं जो मन्नत उसने मांगी थी वो उसे मिल गयी थी और इसी ख़ुशी को पूरा करने के लिये वह महिला एक सोने के थाल में गाय के दूध की खीर भरकर उस वटवृक्ष के पास पहुंची थीं.

उस महिला ने बड़े आराम से सिद्धार्थ को खीर भेंट की और कहा जैसे मेरी मनोकामना पूरी हुई उसी तरह आपकी भी हो. उसी रात को ध्यान लगाने पर सिद्धार्थ की एक साधना सफल हो गयी थीं, उसे सच्चा बोध हुआ तभी से सिद्धार्थ बुद्ध कहलाए. जिसे पीपल वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ को बोध मिला था वह वृक्ष बोधिवृक्ष कहलाया और गया का सीमावर्ती जगह बोधगया कहलाया.

उन्चास दिनों की लम्बी साधना के बाद उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ, तब से वे और वह वृक्ष बोधिवृक्ष कहलाया। आज वह बोधगया के नाम से विख्यात है जहां अनेक बौद्ध मन्दिर बने हुए हैं। बौद्ध भिक्षुक यहां आकर बोधिवृक्ष का दर्शन कर तृप्त हो जाते हैं। बुद्ध बुद्ध कहलाए ने ज्ञानप्राप्ति के बाद घूम-घूमकर इसका प्रचार करना शुरू किया।

गौतम बुद्ध – Gautama Buddha

बुद्धदेव ने पहला उपदेश वाराणसी के निकट सारनाथ में अपने पांच शिष्यों को दिया। उन्होंने बतलाया कि अधिकता किसी भी चीज में अच्छी नहीं है। मनुष्य का पहला कर्तव्य अनुशासित होना है। कारण, अनुशासन विकास का स्तम्भ है। उन्होंने व्यक्ति को क्षमाशील होने की शिक्षा दी और बतलाया कि क्षमा जीवन का महान गुण है। स्वयं उन्होंने अपने चचेरे भाई देवदत्त के अपराध को क्षमा कर दिया।

हम जानते हैं कि देवदत्त बुद्धदेव की लोकप्रियता से बहुत ईर्ष्या करता था और उसने उन्हें क्षति पहुंचाने के लिए हर संभव तरीके का प्रयोग किया। बुद्ध मानते थे कि हम मनुष्य को प्रेम से ही जीत सकते हैं, घृणा से नहीं। ईश्वर द्वारा निर्मित सभी लोगों से प्रेम करना ही सच्ची मानवता है। गौतम ने अपने उपदेशों के प्रचार के लिए शिष्यों की एक टोली बनायी जिसे साधारणतः बौद्ध-विहार कहा जाता है।

पहला बौद्धविहार वेलुवन उद्यान में बनाया गया जिसमें वे निवास भी करते थे। बुद्धदेव अपने गांव कपिलवस्तु भी गए जहां उनका भव्य स्वागत किया गया। अनेक लोगों ने उनकी शिक्षा ग्रहण की। अपने पुत्र राहुल को भी बौद्ध धर्म में उन्होंने शामिल कर लिया।

“बुद्ध शरणं गच्छामि

धम्मं शरणं गच्छामि

संघ शरणं गच्छामि”

गौतम बुद्ध – Gautama Buddha

के नारों से समस्त वातावरण आन्दोलित हो रहा था। यशोधरा बुद्ध से मिलने नहीं आयी। उसे इस बात का बड़ा दुःख था कि उसके पति ने उससे बिना कहे घर छोड़ दिया। एक स्त्री का भी तो अपने पति पर अधिकार होता है, उसे यह विश्वास था कि उसके पतिदेव स्वयं उसके पास आयेंगे। हुआ भी यही स्वयं तथागत उसके पास गए। तब यशोधरा ने उनके चरण चुम्बन किये मैथिलीशरण गुप्त ने यशोधरा की मनोव्यथा का वर्णन करते हुए लिखा है –

“सिद्धि हेतु स्वामी गए, यह गौरव की बात ।

पर चोरी-चोरी गए, यही बड़ा व्याघात I’

बुद्ध ने कपिलवस्तु का परित्याग कर पुनः जन शिक्षा प्रचार में अपना समय लगाया। उन्होंने अंगुलिमाल नामक डाकू को भी अपने उपदेश से प्रभावित किया और उसने भी बौद्ध धर्म की दीक्षा ले ली। प्रसिद्ध व्यापारी अनाथपिण्डिक भी उनका शिष्य बन गया। उसे उपदेश देते हुए बुद्ध ने कहा: “धन होने में कोई भी बुराई नहीं है। धन बुरा नहीं होता, धन के प्रति अधिक मोह बुरा होता है। मनुष्य को अपने धन का उपयोग परमार्थ में करना चाहिए।

बुद्ध ने कहा कि जो व्यक्ति घर में रहकर सन्मार्ग पर चलता हो, उसे गृहत्याग की जरूरत नहीं। शासकों के लिए उन्होंने बतलाया : “अपनी प्रजा को संतानवत् प्यार करना चाहिए। निर्धन और असहाय पर सदैव दयावान होना चाहिए। बुद्धदेव छुआछूत, जाति-पांति के विरोधी थे। स्वयं उन्होंने अछूतों के यहां भोजन किया और उनके प्रमुख शिष्य आनंद ने भी एक चाण्डाल कन्या के हाथों जल ग्रहण किया था। गौतम ने सदा मध्यम मार्ग के अवलम्बन की शिक्षा दी।

गौतम बुद्ध – Gautama Buddha

वे इसकी तुलना सुरीली वीणा से करते थे। यदि वीणा के तार ढीले होंगे तो वीणा बजेगी नहीं और यदि तार अधिक कस दें तो वीणा ही टूट जायेगी। गौतम उपदेश देते-देते गोरखपुर के निकट कुशीनगर पहुंचे और उन्हें अस्सी वर्ष की अवस्थ्य में महानिर्वाण प्राप्त हुआ। उन्होंने अपने समस्त लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा “अप्प दीपो भव” अर्थात् स्वयं दीपक की तरह प्रकाशवान हो बुद्ध के उपदेशों का संकलन ‘त्रिपिटक’ में किया गया है।

इसमें विनयपिटक, सुतपिटक तथा अभिधम्मपिटक आता है। विनयपिटक में संघ के नियमों का, सुतपिटक में बुद्ध के वार्तालाप और उपदेश का तथा अभिधम्मपिटक में दार्शनिक विचारों का संग्रह है। बुद्ध की शिक्षा के सारांश को आर्य सत्य कहते हैं। ये चार है-

(1) सांसारिक जीवन दुःखों से परिपूर्ण है,

(2) दुःखों का कारण है,

(3) दुःखों का अंत सम्भव है,

(4) दुःखों के अंत का उपाय है।

गौतम बुद्ध – Gautama Buddha

इन्हें क्रमशः दुःख, दुःख-समुदाय, दुःख निरोध तथा दुःख-निषेध मार्ग कहा जाता है। दुःख के कारण है, द्वादश निदान वे मानते हैं कि प्रत्येक कार्य का कुछ न कुछ कारण होता है। दुःख है इसलिए इसका भी कारण है जीवन में जरा, मरण, नैराश्य, शोक जरा-मरण का कारण शरीर धारण करना है। जन्म ग्रहण करने की प्रवृत्ति का नाम भव है। बुद्ध का कहना है कि शरीर की उत्पत्ति और विकास एक अन्तर्निहित वासना के कारण होती है।

द्वादश निदानों में अविद्या संस्कार का संबंध भूत जीवन से, विज्ञान, नाम, रूप, पडायतन, स्पर्श, वेदना, तृष्णा, उपादान का संबंध वर्तमान जीवन से, भय, जाति, जरा, मरण का संबंध भविष्य जीवन से है। भोल बुद्ध के अनुसार, दुःख के कारणों का निदान करने से दुःख निरोध होता है। महात्मा बुद्ध ने इसे निर्वाण पक्ष कहा है। निर्वाण की प्राप्ति जीवन काल में भी संभव है। उनके अनुसार मोक्ष प्राप्त व्यक्ति को ‘अर्हत’ कहते हैं। मोक्ष का नाम निर्वाण है।

निर्वाण निष्क्रियता का नाम नहीं, बल्कि राग-द्वेषविहीन जीवन का नाम है। निर्वाण शब्द का अर्थ ‘बुझा हुआ है। बुद्ध के अनुसार, निर्वाण का अर्थ जीवन का अंत नहीं, बल्कि सदा द्वेष से मुक्त होने की अवस्था का नाम है। निर्वाण प्राप्ति के बाद पुनर्जन्म नहीं होता और निर्वाणप्राप्त व्यक्ति का जीवन शान्ति के साथ व्यतीत होता है। निर्वाण प्राप्ति के बाद भी महात्मा बुद्ध ने जीवनभर जनता की सेवा की

महात्मा बुद्ध के अनुसार कर्म दो तरह के हैं। एक कर्म राग, द्वेष और मोह के कारण और दूसरा कर्म बिना राग, द्वेष तथा मोह के कारण है। पहला कर्म विषयानुरक्ति का परिचायक है जबकि दूसरा संसार के अनासक्त भाव का सूचक है। अनासक्त भाव से कर्म करने वाले व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता। महात्मा बुद्ध के अनुसार दुःख निरोध मार्ग के आठ अंग हैं जिन्हें बौद्ध साहित्य में अष्टांगिक कहते हैं :

(1) सम्यक दृष्टि,

(2) सम्यक् संकल्प,

(3) सम्यक् वाक्,

(4) सम्यक् कर्मात,

(5) सम्यक् जीवन,

(6) सम्यक् व्यायाम,

(7) सम्यक् स्मृति,

(8) सम्यक् समाधि या ध्यान सम्यक्

गौतम बुद्ध – Gautama Buddha

समाधि प्राप्ति के बाद मनुष्य के सभी प्रकार के संदेह दूर हो जाते हैं। बुद्ध के अनुसार शील और प्रज्ञा एक-दूसरे को मजबूत करते हैं। अष्टांगिक मार्ग की साधना से विचार, प्रेरणा तथा भावनाओं में शिष्टता आ जाती है महात्मा बुद्ध के उपदेश सरल और आडम्बरहीन हैं। ये उपदेश अभी भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं जिनसे ढाई हजार साल पहले थे।

यही कारण है कि महात्मा बुद्ध के बाद उनके अनेक शिष्यों ने भारत के बाहर इसका प्रचार किया। सम्राट् अशोक, सम्राट् कनिष्क और हर्षवर्द्धन ने भी बुद्ध के उपदेशों का चीन, जापान, जावा, सुमात्रा, लंका, बर्मा, श्याम आदि देशों में प्रचार कराया ।आज संसार तृतीय विश्वयुद्ध की आशंका से संत्रस्त है। विश्वबंधुत्व, मैत्री, करुणा, प्रेम के द्वारा हम दुनिया में शान्ति की स्थापना कर सकते हैं।

गौतम बुद्ध – Gautama Buddha

हम संघर्ष से नहीं, सहयोग से संसार का कल्याण कर सकते हैं। महात्मा बुद्ध के सत्य, अहिंसा, प्रेम, शील के उपदेश आज भी ग्राह्य है। हमारा विश्वास है कि हम उनके उपदेशों पर चलकर विश्व का उत्थान और सम्पूर्ण मानव समुदाय का कल्याण कर सकेंगे। महात्मा बुद्ध सारी आयु धर्म का प्रचार करते रहे। अन्त में इसका प्रचार करते करते अस्सी वर्ष की आयु में कुशीनगर में उनका देहावसान हो गया। वे मर कर भी अमर हो गए। आज भी उनके लाखों अनुभवी उन्हें भगवान के समान पूजते हैं।

Shetkaryancha Asud

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